वो एक सपना था

जब प्यास लगी तो मैने देखा ,
पानी था नही मदार में ,
वो तो बिक रहा कोडियो में ,
उन अफसरों की दुकान में|
उस पानी को लेने पहुंचे,
हकीम और सुनार हैं
मैं पीने पहुंची उस पानी को ,
वो पानी नही शराब थी ,
अचरज मे जिसने डाल दिया ,
गहरी निद्रा को हिला दिया
मुझे नीद से जगा दिया ,
वो सपना मेरा तोड़ दिया|

Comments

gaurav verma said…
great yaar,
deepti ji ye idea laati kahan se ho tum
Unknown said…
dost.............
.for future
best of luck
deepti sharma said…
thanks shivam
but tm kaun ho
इस कविता में बहुत सम्भावनाएँ हैं। कभी विस्तार दीजिएगा।

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