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Showing posts from October, 2012

वो अधजली लौ

रौशनी तो उतनी ही देती है
कि सारा जहाँ जगमगा दे
निरंतर जल हर चेहरे पर
खुशियों की नदियाँ बहा दे
फिर भी नकारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

मूक बन हर विपत्ति सह
पराश्रयी बन जलती जाती
परिंदों को आकर्षित कर
जलाने का पाप भी सह जाती
फिर भी दुत्कारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

जीवन पथ पर तिल तिल जलती
आघृणि नहीं बन कर शशि
हर घर को तेज से अपने
रौशन करते हुए है चलती
फिर भी धिक्कारी जाती है क्यों??
वो अधजली लौ

अपना अस्तित्व कब खोज पायेगी
दूसरों के लिये नहीं अपने लिये
ये भी मुस्कुराकर जी जायेगी
बनावटी नहीं खालिस बन
कब पहचानी जायेगी??
वो अधजली लौ
यथार्थ के नीले गगन में
बह रहें हैं भाव मेरे
पीर परायी सुन सुनकर
दिल में उपजे हैं घाव मेरे
सुनो जरा क्या हुआ है देखो
तुम बन गये हो हमराज मेरे
मधुर गीत सुनकर तुम्हारे
गूँज उठे हैं राग मेरे
तराशा है खुद को तुम्हारे लिये
तुम बन गये हो अभिमान मेरे
©दीप्ति शर्मा
धमकी देकर बचतें हो
तहख़ानों में क्यों छुपते हो
सामने आकर करो प्रहार
मंत्रालय से क्यों बकते हो ।
© दीप्ति शर्मा
कब कहती रूक जाऊँगी
मैं तुमको जो ना पाऊँगी
गहरे दरिया की मैं कश्ती
अकेले पार पा जाऊँगी ।
© दीप्ति शर्मा