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Showing posts from 2018

कविता

प्रेम की चिट्ठियों !
तुम्हारे शब्द
मेरे रक्त का वेग हैं
जो मेरे भीतर
जन्म-जन्मातर तक
प्रवाहित होते रहेंगे
मष्तिष्क की लकीरों से
आँखों की झुर्रियों तक का सफर
तय किया है साथ में हमनेंचिट्ठियां पुरानी नहीं होती
वह अहसासों में बसती है
वर्ष बीत जाते हैं बस
बीते वर्षों में
कुछ यादों ने
कँपते हाथों में
जान डाल दी
देखो साँस चल रही
बोल नहीं निकले तो क्या
वेंटिलेटर पर हूँ
चिट्ठियां थामेंये क्या!
बँधी मुट्ठियाँ खुल गयी
जीवन के अंतिम वक्त में
चिट्ठियां छूट रही
साँस टूट रही
मेरी आँखें बंद हो रही
तुम्हारे अक्षर धुल रहे
अब लगता है, पुरानी हो जाएगीं चिट्ठियां
सुनो! रोना मत
मेरे जाने के बाद
आखिरी चिट्ठी में
तुम रोये थे
कह गये थे रोना मत
मैं रो नहीं रही
समय अब मेरा नहीं रहा ना
क्योंकि एक समय बीत जाने पर
मिट जाता है भूतकाल
और देखा जाता है भविष्य
प्रेम
चिट्ठियां
यादें
पुराने समय की बात हो चली
अब तो डाकिया भी नहीं आता।
@ दीप्ति शर्मा
रात के पलछिन और तुम्हारी याद
वो बरसात की रात
कोर भीग रहे, कुछ सूख रहे
कँपते हाथ पर्दा हटा
देख रहे चाँद
जैसे दिख रहे तुम
हँस रहे तुम
गा रहे तुम
उस धुन और मद्धम चाँदनी में
खो रही मैं
रो रही मैं
रात सवेरा लाती है
तुमको नहीं लाती
आँसू लाती
नींदें लाती
सपने लाती
मैं दिन रात के फेर में
फँस रही हूँ
जकड़ रही हूँ
कुछ है जो बाँध रहा
ये रात ढल नहीं रही
और तुम हो कि आते नहीं
मुस्कुराते हो बस दूर खड़े
सुन लो
मुस्कुरा लो
जितना मुस्कुराओगे
मैं उतना रोऊँगी
नहीं बीतने दूँगी रात
मैं भी रात के शून्य में
विलीन हो
मौन हो जाऊँगी
सुन लो तुम।  @दीप्ति शर्मा
मैं चीख रही ,
मेरा लहू धधक रहा
कहीं सड़क लाल तो
कहीं बदरंग हो रही
पर ना बिजली चमकी
ना बरसात हुई
ना आँधी आयी
आयी तो उदासी
बस नसीब में मेरे
सुन ख़ुदा !
तू बहरा हो गया क्या ?
-दीप्ति शर्मा
नीले आसमां को देखती
निगाहों की टकटकी,
आँखों से रिसते पानी को
सुबह की ओस से
रात का तारा बना देती  है ।
@दीप्ति शर्मा
ये अमावस तारीखों में दर्ज हुयी बीत जाएगी,
पर जो तुम मन में बसा लिए हो
वो अमावस कभी क्या बीत पाएगी ?
जवाब यही कि वक्त तो आने दो
वक्त भी आया और गया
पर अमावस ना खतम हुयी
देखो मन तो तुम्हारा
अँधेरी सुरंग हुआ जा रहा
बदबू साँस रोक रही
कैसे जी रहे हो तुम?
यहाँ मेरा दम घुट रहा।
#अमावसकीरात और
#तुमकोसमझतीदीप्ति