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Showing posts from November, 2012
दिल पर तुम यूँ छा रही हो
लगता है पास आ रही हो
जुल्फ़ों के साये में छुप मुझे
देख हाय यूँ इतरा रही हो
कातिल मुस्कुराहट से तुम
दिल की कली खिला रही हो
रुख से अपने बलखा रही हो
मुत्तसिर हो तुम मुझसे
करीब आ मेरे दिल के
क्यों मुझसे शरमा रही हो
© दीप्ति शर्मा

फसल

वर्षों पहले बोयी और
आँसूओं से सींची फसल
अब बड़ी हो गयी है
नहीं जानती मैं!!
कैसे काट पाऊँगी उसे
वो तो डटकर खड़ी हो गयी है
आज सबसे बड़ी हो गयी है
कुछ गुरूर है उसको
मुझे झकझोर देने का
मेरे सपनों को तोड़ देने का
अपने अहं से इतरा और
गुनगुना रही वो
अब खड़ी हो गयी है
आज सबसे बड़ी हो गयी है ।
वो पक जायेगी एक दिन
और बालियाँ भी आयेंगी
फिर भी क्या वो मुझे
इसी तरह चिढायेगी
और मुस्कुराकर इठलायेगी
या हालातों से टूट जायेगी
पर जानती हूँ एक ना एक दिन
वो सूख जायेगी
पर खुद ब खुद © दीप्ति शर्मा

तस्वीरें

अक्सर सवाल करती हूँ
उन टँगी तस्वीरों से
क्या वो बोलती हैं??
नहीं ना !!
फिर क्यों एक टक
यूँ मौन रह देखतीं हैं मुझे
कि जैसे जानती हैं
हर एक रहस्य जो कैद है
मन के अँधेरे खँड़रों में
क्या जवाब दे सकती हैं
मेरी उलझनों का
कुछ उड़ते हुए
असहाय सवालों का
जो मौन में दबा रखे हैं
शायद कहीं भीतर ।
©दीप्ति शर्मा