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Showing posts from October, 2011

कब

कैद हैं कुछ  यादों के भंवर  जो सुलगते हैं  पर पिघलेगे कब ? - दीप्ति शर्मा 

भ्रष्टाचार आन्दोलन के "साइड इफेक्ट"

बहुत सारी भीड़ है | वो देश सुधार और भ्रष्टाचार को मिटाने का आन्दोलन कर रहे हैं ,  सारी सड़के जाम हैं , जनता बेहाल है , सरकार का बुरा हाल है , ये समाधान है या  कोई व्यवधान है जो  यहाँ हर कोई परेशान है
तभी एक एम्बुलेंस दूर से आती है , उस भीड़ में वो फंस  जाती है , मरीज की हालत गंभीर है पर कोई उसे निकलने नही दे रहा है क्यूँ की  वो समाज सेवी है और देश का सुधार कर रहें हैं |
नारें लगा रहें वो देखो  लोगो का हुजूम बना  और समाज चला रहे हैं  वो जो तड़प रहा है अंदर  देख उसे नजरे झुका रहे हैं  न ही वो उनका सगा है  न ही सम्बन्धी है फिर  क्यों दिखावे में नहा रहें हैं  तड़प रहा है वो इलाज को  और देखो ये सब यहाँ  भ्रष्टाचार मिटा रहे हैं |
बहुत सारी भीड़ इकट्ठी है , सरकार के खिलाफ कुछ हैं जो सच में साथ हैं और कुछ लोग दिमाग से वहा और मन से दफ्तर में हैं , जहाँ कोई आएगा घुस देके जायेगा , वो दलाल है सरकार के जिनके आँखों में हमेशा से ही पट्टी बंधी है |
सरकार के खिलाफ बन खड़ें हैं हाथों में मशाल लिए अड़े हैं  दिल से यहाँ पर दिमाग से वहां  जहा घुस मिल जाएगी  क्यों जिद कर वो  दिखावे को पड़े हैं  घुस खाकर पेट भरता है जिनका  क्यों वो आम …

तेरे लाज के घूँघट से

उमड़ आयी बदली  तेरे लाज के घूँघट से  द्वार पर  खड़ी तू  बेतस बाट जोहती  झलक गये तेरे केशू तेरे आँखों के अर्पण से |
पनघट पे तेरा आना  भेष बदल गगरी छलकाना  छलक गयी गगरी तेरी  तेरे लाज के घूँघट से |
सजीले पंख सजाना  प्रतिध्वनित  वेग से  झरकर गिर आयी  तेरे पाजेब की रुनझुन से |
रागों को त्याग  निष्प्राण तन में उज्जवल  उस अनछुई छुअन में  बरस गयी बदली  तेरे लाज के घूँघट से  उमड़ आयी बदली  तेरे लाज के घूँघट से  - दीप्ति शर्मा