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कब




कैद हैं कुछ 
यादों के भंवर 
जो सुलगते हैं 
पर पिघलेगे कब ?
- दीप्ति शर्मा 

Comments

Anonymous said…
honge jarur honge!!!
समय आने पर वह ज्वार पिघलेगा।
वाह ..
आपको दीपावली की शुभकामनाएं !!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति |

दीवाली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|
उम्‍मीद पर दुनिया कायम है...

सुंदर प्रस्‍तुति।
आपको और आपके परिवार को दीप पर्व की शुभकामनाएं......
वाह!

आपको सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएँ!

सादर
दीवाली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ|
Amrita Tanmay said…
.**शुभ दीपावली **
सुन्दर प्रस्तुति
आपको और आपके प्रियजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें….!

संजय भास्कर
आदत....मुस्कुराने की
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
हर चीज़ अपने समय पर होती है ..
दीपावली की मंगल कामनाएं ..
सर्दी के इस ख़ुश्क मौसम में सुलगती हुई एक लघु आकार की साकार कोशिश....शुभकामनायें......
तुम्हारा यह प्रिय स्पर्श जो छूने के बाद छुटता नहीं__इन भावनाओं के भंवर को रुकने मत दो__सुलगने दो__स्नेही तुम समझो__इससे सुलगने से ही तुम्हारी संचेतना और बढती जायेगी और अंधों को प्रकाश |

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !