Monday, July 25, 2016

मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !

Monday, February 8, 2016

आहट


घने कोहरे में बादलों की आहट
तैरती यादों को बरसा रही है
देखो महसूस करो
किसी अपने के होने को
तो आहटें संवाद करेंगी
फिर ये मौन टूटेगा ही
जब धरती भीग जायेगी
तब ये बारिश नहीं कहलायेगी
तब मुझे ये तुम्हारी आहटों की संरचना सी प्रतीत होगी
और मेरा मौन आहटों में
मुखरित हो जायेगा।

© दीप्ति शर्मा

Sunday, January 3, 2016

माँ

ये वो माँ है जिसके सारे बच्चे अच्छे पद व रुतबे,
कोठी व कार वाले हैं
ये वो माँ है जिसने दो रुपये की खादी की साड़ी पहन बच्चों को  अच्छे कपड़े पहनाये
ये वो माँ है जो खुद भूखी रही पर बच्चों का पेट भरा
खुद के बच्चों का पालन सब करते हैं
ये वो माँ है जिसने अपने बच्चों के साथ दूसरे बच्चे भी पाले उनकी भी शादियाँ करायी
ये वो माँ है जो आज तरसती है
दो रोटी के लिए
ये वो माँ है जो परेशान है अपनों के दिए दर्द से
ये वो माँ है जो अकेली है सबके होते एकदम अकेली
ये वो माँ है जो छुप गयी है चेहरे की झुर्रीयों में
ये वो माँ है जिसके सफ़ेद बालों ने अँधेरा होने का अहसास कराया है
हाँ ये वही माँ है जिसके कँपते हाथ अब तुम्हारे काम नहीं आते
वही माँ है यह जिसकी बूढ़ी आँखें अब तक बच्चों का रास्ता तक रही हैं
जो बंद होने से पहले कुछ मोहलत लिए हुए एकटक खुली रह गयी हैं

Sunday, November 29, 2015

रास्ते पर थके पाँव
चली जा रही हूँ
उस ऊँचे टीले को देखती
जहाँ धीरे से उतरती
गर्भवती महिला पति को थामे
फिर तभी तेज रफ्तार
भागती गाड़ियाँ
और वहीं सामने स्कूल
जिसका छूट्टी का घण्टा बज रहा है
स्कूल से बच्चों का तेजी से निकल
सड़क पार करना
थककर बगल के चबूतरे पर बैठी
सोच रही हूँ
सब व्यस्त हैं
सबकी अपनी दिनचर्या
और मेरी दिनचर्या
सबको यूँ ही देखते रहना
नहीं!
या चलते जाना
शायद ये भी नहीं!
जीवन में अनुभव बटोरना
हाँ यह संभव है
और बुजुर्ग होने पर कहना
अनुभव है मुझमें भी बरसों का
यूँ ही बाल सफेद नहीं हुए
सामने से प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करना
और कहना मेरी बात सुनो
ना सुने जाने पर
फिर खो जाना उन्हीं दौड़ती सड़कों पर
या फिर चल पड़ना थके पाँव
जीवन को समझने
या खुद को समझाने।

Thursday, December 18, 2014

अभी कुछ देरपहले
मुझे आवाज़ आयी
माँ , मैं यहाँ खुश हूँ
सब  बैखोफ घूमते हैं
कोई रोटी के लिये नहीं लड़ता
धर्म के लिये नहीं लड़ता
देश के लिये,
उसकी सीमाओं के लिये नहीं लड़ता
देखो माँ
हम हाथ पकड़े यहाँ
साथ में खड़े हैं
सबको देख रहे हैं
माँ, बाबा से भी कहना
कि रोये नहीं
हम आयेगें फिर आयेगें
पर पहले हम जीना सीख लें
फिर सीखायेगें उनको भी
जिन्हें जीना नहीं आता
मारना आता है
माँ, आँसू पोंछकर देखो मुझे
मैं दिख रहा हूँ ना! 
हम सभी आयेगें पर तभी
जब वो दुनिया अपनी सी होगी
नहीं तो हम बच्चे
उस धरती पर कभी जन्म नहीं लेगें
तब दुनिया नष्ट हो जायेगी
है ना! 
पर उससे पहले
माँ, बाबा आप
यहाँ आ जाना हमारे पास
हम यहीं रहेगें
फिर कोई हमें अलग नहीं करेगा
तब तक के लिये तुम मत रोना
हम सब देख रहे हैं
और मैं रोते हुए चुप हूँ
बस एक टक देख रही हूँ
तुझे बेटा
तेरे होने के अहसास के साथ
©दीप्ति शर्मा

Sunday, December 7, 2014

मुट्ठियाँ

बंद मुट्ठी के बीचों - बीच
एकत्र किये स्मृतियों के चिन्ह
कितने सुन्दर जान पड़ रहे हैं
रात के चादर की स्याह
रंग में डूबा हर एक अक्षर
उन स्मृतियों का
निकल रहा है मुट्ठी की ढीली पकड़ से
मैं मुट्ठियों को बंद करती
खुले बालों के साथ
उन स्मृतियों को समेट रही हूँ
वहीं दूर से आती फीकी चाँदनी
धीरे - धीरे तेज होकर
स्मृतियों को देदीप्यमान कर
आज्ञा दे रही हैं
खुले वातावरण में विचरो ,
मुट्ठियों की कैद से बाहर
और ऐलान कर दो
तुम दीप्ति हो, प्रकाशमय हो
बस यूँ ही धीरे - धीरे
मेरी मुट्ठियाँ खुल गयीं
और आजाद हो गयीं स्मृतियाँ
सदा के लिये
©दीप्ति शर्मा

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