Thursday 16 May 2013

रेखाएँ

हाथ की कुछ रेखाएँ
अब गहरी हो गयी हैं
ना जाने ये
किस बात का अंदेशा है
नये जीवन के आगमन का
या इस जीवन की मुक्ति का

-दीप्ति शर्मा


Saturday 11 May 2013

एक दरियाफ्त की थी
 कभी ईश्वर से
दे दो मुट्ठी भर आसमान
आज़ादी से उड़ने के लिए
और आज उसने
ज़िन्दगी का पिंजरा खोल दिया
और कहा ले उड़ ले .।

- दीप्ति शर्मा


Friday 10 May 2013

निशान



किसी एक जगह पर 
निशान पड़ गये हैं 
मैं तो सीमा पर खड़ी हूँ 
और धसते जा रहें हैं पैर 
बन्दुक की नोक पर 
या सीमा से दलदल पर 
ना जाने
रेत पर भी पक्के निशान 
कैसे पड़ जाते हैं
-दीप्ति शर्मा


Wednesday 8 May 2013

कहते हैं पुनर्जन्म के फल
भोगने पड़ते हैं इस जनम में
तो क्या मिल जाता है
इस जनम का वो ही
प्यार , सोहार्द , अपनापन
अगले जनम में भी ।

- दीप्ति शर्मा 

Monday 6 May 2013

सरबजीत की याद में

हिरासत में था
कई सालों से
यातनाओं से घिरा
न्याय की आस लिए
मैं जासूस नहीं
आम इन्सान था
जो गलती कर बैठा
ये देश की सीमायें
नहीं जानी कभी
सब अपना सा लगा पर
बर्बरतापूर्ण व्यवहार जो किया
वो कब तक सहता
आज़ाद हो लौटना था मुझे
अपने परिवार के पास
पर वो जेहादी ताकतें
मुझ पर हावी थीं
नफरत का शिकार बना
और क्रूरता के इस खेल में
मुझे अपनी सच्चाई की कीमत
जान देकर चुकानी पड़ी ।
सुनो मैं अब भी कहता हूँ
मैं जासूस नहीं था
पर  अपने ही देश ने मुझे
बेसहारा छोड़ दिया था
उस पडोसी देश की जेल में
परिवार से दूर कितनी ही यातनायें सहीं
बार बार हमले हुए
पर आख़िरकार इस बार
मैं हार गया
नहीं जीत पाया
मैं हार गया ।

Sunday 5 May 2013

उन्मुक्तता



क्यों मिल गयी संतुष्टि
उन्मुक्त उड़ान भरने की
जो रौंध देते हो पग में
उसे रोते , कराहते
फिर भी मूर्त बन
सहन करना मज़बूरी है
क्या कोई सह पाता है
रौंदा जाना ???
वो हवा जो गिरा देती है
टहनियों से उन पत्तियों को
जो बिखर जाती हैं यहाँ वहाँ
और तुम्हारे द्वारा रौंधा जाना
स्वीकार नहीं उन्हें
तकलीफ होती है
क्या खुश होता है कोई
रौंधे जाने से ??
शायद नहीं
बस सहती हैं और
वो तल्लीनता तुम्हारी
ओह याद नहीं अब  तुम्हें
भेदती है अब वो छुअन
जो कभी मदमुग्ध करती
तुम्हारी ऊब से खुद को निकालती
अब प्रतीक्षा - रत हैं वो
खुद को पहचाने जाने का
टूटकर भी
खुशहाल जीवन बिताने का
क्या जीने दोगे तुम उन्हें
उस छत के नीचे अधिकार से
उनके स्वाभिमान से
या रौंधते रहोगे हमेशा !!!
अपने अहंकार से
इस पुरुषवादी समाज में
आखिर कब मिल पायेगी
उन्हें उन्मुक्तता ???
-  दीप्ति शर्मा

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