डायरी के पन्नें

ये उन दिनों की बात है जब हम मिले पहली दफा स्टेशनपर अनजान से , दूसरी दफा ताजमहल
कितनी मन्नतों के बाद ये दिन आया था तुम और ताजमहल पास ही ,सपना लग रहा जैसे ,ताजमहल देखना बचपन की तमन्ना और तुम्हारा मिलना तो लगता हर तमन्ना पूरी हो गयी
तुम्हारी बाहों के आगोश में यमुना के पानी में पैर डुबो महसूस करती रही तुम्हें 
प्यार यहीं है बस 
ताजमहल की यादें कड़ी नंबर एक
#दीप्तिशर्मा

Comments

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (06-05-2020) को   "शराब पीयेगा तो ही जीयेगा इंडिया"   (चर्चा अंक-3893)    पर भी होगी। -- 
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
-- 
आप सब लोग अपने और अपनों के लिए घर में ही रहें।  
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
--
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 

yashoda Agrawal said…
आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 05 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
हाय राम बस इत्तु सी बात , जे नहीं चलेगा जी बहुत सारा लिखिए और फ़टाफ़ट लिख डालिये
और हाँ ये मॉडरेशन की व्यवस्था को ख़त्म करिये अब इसकी कोई जरूरत नहीं है जी
वाह !बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति
Onkar said…
बहुत सुन्दर
बहुत खूब ।
दूसरी कड़ी का इंतजार रहेगा।

Popular posts from this blog

मैं

बताऊँ मैं कैसे तुझे ?