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डायरी के पन्नें किस्त दूसरी

ताजमहल की यादें कड़ी नं दो
ताजमहल के बारे में लोग सुनते हैं फिर सहसा खींचें आते हैं। ताजमहल के शहर की एक लड़की मुँह पर कपड़ा बाँधें, रेलवे स्टेशन पर किसी का इंतजार कर रही है,हर बार गाडियों के हार्न पर वह चौंक नजरें इधर-उधर घुमा रही, किसी का इंतजार था बेसब्र थी, कई गाड़ियां, चेहरे आये गये हुए और उसकी नजरें एकटक जमा थी पटरियों पर कि जैसे अचानक कोई ट्रेन आयेगी और ....... सोचते हुए एक और हार्न बजा, गाड़ी रूकी, गाड़ी रूकने के साथ धड़कनें बढ़ने लगी, वो शक्स दिख गया और आँखें झुक गयी तभी याद आया चेहरा ढँका है सामने वाला पहचानेगा कैसे?
हाथ हिलाते हुए उसका नाम लेकर बुलाया और ये मुलाकात स्टेशन पर।
सामने बैठे दो शक्स और बात कोई कर नहीं रहा, लड़की बोली ताजमहल चलें?
अब इस बार ताजमहल और ऊँट की सवारी, ऊँट का हिलना दोनों का मिलना।
दोनों बाहों में बाहें डाल घूमते रहे,मुलाकातें कितना रोमांच दे जाती हैं न खासतौर पर जब आप अनजान हों और एक दूसरे को समझ रहें हो,समझ-बूझकर स्टेशन आकर फिर घर लौट आयी।
ताजमहल के शहर की लड़की जिसकी ये मुलाकात भी यादगार रही।
ताजमहल के साथ उसके किस्से भी खूबसूरत होते हैं।
#दीप्तिशर्मा
#डायरीकेपन्नें

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मैं

दिल में उठे हर इक 
सवाल की भाषा हूँ |
सिमटे हुए अहसासों को  जगाने की अभिलाषा हूँ |
गहरा है हर जज्बात  जज्बातों से पलते  खवाब की परिभाषा हूँ |
अकेली हूँ जहाँ में पर  जगती हुई  मैं आशा हूँ |

- दीप्ति शर्मा

बताऊँ मैं कैसे तुझे ?

वो लम्हे हमें हैं अब याद आते , ना भूले हैं जानम ना भूल पाते ,बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो लहरों की कस्ती ,वो फूलो की वादी ,सितारों की झिलमिल ,कहाँ खो गयी ,बताऊँ मैं कैसे तुझे ?
वो चूड़ी की छनछन ,वो पायल की खनखन , कहाँ खो गयी ,बताऊँ  मैं कैसे तुझे ?
वो कोयल की कूंह कूंह ,वो झरने का झरना ,रिमझिम सी बारिश,कहाँ खो गयी ,बताऊँ मैं कैसे तुझे ?
फूलों की ख़ुशबू ,महकता वो आँगन ,मोहब्बत वो मेरी ,कहाँ  खो गयी ,बताऊँ  मैं कैसे तुझे ?

- दीप्ति 

पिता

पिता
मेरी धमनियों में दौड़ता रक्त
और तुम्हारी रिक्तता
महसूस करती मैं,
चेहरे की रंगत का तुमसा होना
सुकून भर देता है मुझमें
मैं हूँ पर तुमसी
दिखती तो हूँ खैर
हर खूबी तुम्हारी पा नहीं सकी
पिता
सहनशीलता तुम्हारी,
गलतियों के बावजूद माफ़ करने की
साथ चलने की
सब जानते चुप रहने की
मुझे नहीं मिली
मैं मुँहफट हूँ कुछ,  तुमसी नहीं
पर होना चाहती हूँ
सहनशील
तुम्हारे कर्तव्यों सी निष्ठ बन जाऊँ एक रोज
पिता
महसूस करती हूँ
मुरझाए चेहरे के पीछे का दर्द
तेज चिड़चिड़ाती रौशनी में काम करते हाथ
कौन कहता है पिता मेहनती नहीं होते
उनकी भी बिवाइयों में दरार नहीं होती है
चेहरे पर झुर्रियां
कलेजे में अनगिनत दर्द समेटे
आँखों में आँसू छिपा
प्यार का अथाह सागर
होता है पिता
तुम
सागर हो
आकाश हो
रक्त हो
बीज हो
मुझमें हो
बस और क्या चाहिए
पिता
जो मैं हू-ब-हू तुमसी हो जाऊँ ।__ Deepti Sharma