यादों का पिटारा

हमशक्ल होते हैं क्या? मैं नहीं मानती थी पर एक बार हुआ यूँ कि मैंने पाँचवीं के पेपर दिये,कॉलोनी के सारे बच्चे छटवीं में नये स्कूल जा रहे थे, उस समय जीजीआईसी में बहुत से बच्चे गये, मेरा भी मन था पर पापा ने मेरा दाखिला दयानंद विद्या मंदिर पिथौरागढ़ में कराया। मन में उत्साह था, नया स्कूल नये लोग पर जब पहले दिन स्कूल गयी तो सब मुझे सरस्वती बुला रहे थे और कह रहे थे कि मेरे बाल बड़े थे छोटे क्यों कराये?
मैं हैरान! परेशान
बाल तो मेरे ऐसे ही थे!
मैंने बताया मैं सरस्वती नहीं दीप्ति हूँ पर कोई माने ना, कागज दिखाने पड़े, तब पता चला कि मेरी हमशक्ल सरस्वती इसी साल स्कूल छोड़ गयी और मैं आ गयी।
उस स्कूल में एक साल पढ़ी पर यादों का पिटारा है।
तस्वीर उन्हीं दिनों की है बीच में हरी चुनरी वाली मैं दीप्ति, सरस्वती नहीं 😃
#यादोंकापिटारा 
#पिथौरागढ़ 
अगली किस्त फिर कभी

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हा हा हा हा दिलचस्प इत्तेफाक है जी | अगली क़िस्त की प्रतीक्षा रहेगी बेसब्री से

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