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Showing posts from January, 2011

मन की बात

कई बार कई उम्मीदों को दिल में जगह पाते फिर टूटते हुए महसूस किया है | जिन्दगी मे सभी के साथ की जरुरत होती है ,
मैं भी सभी का साथ चाहती हूँ , पर पहल मुझे ही क्यों करनी पड़ती है ,फिर भी निराशा ही हाथ लगती है |
निराशा को तोड़ता वो ख़ुशी का बादल दूर से आता दिखाई देता है , तो कुछ पल बाद वो भी ओझल हो जाता है |
कितने रिश्ते बनते हैं तो ना जाने कितने बिछुड़ जाते हैं , फिर भी जिन्दगी की नाव हिलती डुलती चलती ही रहती है |
कभी ख़ुशी तो कभी गम सहते हुए ये जिन्दगी बढती ही जाती है |
कितनी ही निराशा हाथ लगती है पर उम्मीद दामन नही छोडती , एक उम्मीद के ख़तम होते ही एक नयी उम्मीद जगती है और उस को साकार करने का प्रयत्न होने लगता है, शायद ये तो पूरी हो जाये |
उम्मीदों के भवर मे फंसी मैं एक उम्मीद पूरी होने होने की दरियाफ्त खुदा से करती हूँ ,
चाहे हो जाये कुछ ,
अपनों का साथ ना छूटे कभी ,
ना दुखे दिल किसी का  अपने मेरे ना रूठे कभी |



- दीप्ति शर्मा

झरना

क्यूँ दर्द समझ कर भी,
नासमझ बना करते हैं|
वो पत्थर के रोने को
झरना कहा करते हैं
और उसे देख के हँसते हैं |
खलिश दबा सीने में
तन्हा जीया करते हैं ,                  
तमन्ना नही कोई बस में
जान के हर अश्क का
अफ़सोस किया करते हैं,
वो पत्थर के रोने को
झरना कहा करते हैं
और उसे देख के हँसते हैं|
तस्कीरे बना हर इल्ज्म
को अधिकार दिया करते हैं,
दिल के जख्मो को जो
नकार दिया करते हैं,
इंसानों के आंसू को
देखा भी नही करते हैं,
वो पत्थर के रोने को
झरना कहा करते हैं,
और उसे देख के हँसते हैं |

- दीप्ति शर्मा

मैं

दिल में उठे हर इक 
सवाल की भाषा हूँ |
सिमटे हुए अहसासों को  जगाने की अभिलाषा हूँ |
गहरा है हर जज्बात  जज्बातों से पलते  खवाब की परिभाषा हूँ |
अकेली हूँ जहाँ में पर  जगती हुई  मैं आशा हूँ |

- दीप्ति शर्मा

मैं आ गयी हूँ लौटकर

मैं आ गयी हूँ लौटकर 
अहसासों के दामन में
कुछ अनछुए पहलुओं 
को आजमाकर उन्हें
जिन्दगी का हिस्सा बनाने 
मैं आ गयी हूँ लौटकर |
कुछ बातें अनकहीं 
कुछ बातें अनसुनी
हर जज्बात सुनाने 
मैं आ गयी हूँ लौटकर |
दूर थी मैं अपनों से
उन अपनों का साथ पाने 
कुछ किस्से सुनने और
कुछ सबको बताने 
ख्वाहिसों को बटोरकर
मैं आ गयी हूँ लौटकर |
- दीप्ति शर्मा