दर्द

जब भी उसे देखती ये दिल सिहर उठता, उसकी खामोश बेचेनी से भरी आँखे आंसुओ  के सहारे सब कुछ बायान कर देती |
वो कुछ भी ना कहते हुए भी सब कुछ कह जाती | उन आँखों में जितना दर्द था , उतनी ही तड़प भी |
तड़प तड़प के जीना कितना दुश्वार होता है लेकिन मजबूरियां तो देखो जिसने उसे तड़प कर जीने पर मजबूर कर दिया, जिन्दगी तो मानो वीरान ही हो गयी, देखकर उसे एसा लगता मानो जीने की तमन्ना  विलुप्त हो रही हो|
ना रोती थी, ना हँसती  थी, और कभी कभी रोते हँसते  अपना आपा ही खो बैठती|
लोग तो उसे पागल समझने लगे पर किसी को क्या पता कितने दर्द सहे थे उसने ,
अपनों से दिया गया वो दर्द उसे हर समय सुई के समान चुभता ,पर किसी ने उसकी
तड़प ना समझी , पागल समझ पागलखाने में  डाल दिया , जहा उसकेl साथ जानवरों से बत्तर सलूक किया जाता , अंततः तड़प की सीमा टूटी, दर्द का अंत हुआ और उसका अंत हो गया\ वह बर्दाश्त नही कर सकी, और अपने  दर्द को जगजाहिर  ना करते हुए अपने साथ ले गयी |

Comments

Popular posts from this blog

बस यूँ ही

डायरी के पन्नें

मैं