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मैं

मैं कुछ लिखना चाहती हूँ ,
हूँ तन्हा पर पता नहीं ,
पर जिंदगी से अनजान ,
इस कायनात में रहकर 
कुछ नाम कमाना चाहती हूँ |
जो मुझे मेरी मंजिल दे ,
और  दे वो मुझे सारी ख़ुशी ,
अनजानी उन खुशियों को ,
दिल से महसूस कर ,
जिंदगी को जीना चाहती हूँ |
ख्वाबो को पूरा कर मैं,
इस नीले गगन के नीचे,
पक्छियो की तरह पंख फैला ,
आज़ादी  से उड़ना चाहती हूँ |
मैं जिंदगी की राह मे ,
बहुत दूर जाना चाहती हूँ |

Comments

hum jante hai ki zindgi me chahto ko sanjo kar chalna aasan hai lekin meri chaht or mera khvaab mujhe bas ummid hi dete hai jeevan me kuch karne ya badne ki jis ummid ke sahare hum sabhi ek udan bharte hai .... shayd yw wahi rah hai ....
best of luck
:-)
इस नीले गगन के नीचे,
पक्छियो की तरह पंख फैला ,
आज़ादी से उड़ना चाहती हूँ |

kya bata hai..sabki chahat hoti hai ye hai na??/

acha laga

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !