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टकटकी आँखें गड़ाये
मोटा सा चश्मा लगाये
वो हर सुबह बड़े ध्यान से
पढ़ा करते हैं अखबार
हम देखे उनको रोज रोज
पड़ जाते अचरज में बार बार
तो सोचा पूछे या ना पूछे
कि वो क्यों हैं परेशान
अन्तत: पूछ लिया
क्यों चच्चा...
क्या है राज
क्यों पढ़ते इतना ध्यान लगाये
रोज एक ही पन्ने को आप
मुरझाते से चेहरे के साथ
सिर खुजलाते बोले चच्चा
सुनो ओ रे बच्चा
उमर हो गयी 55 साल
और अब तक
नहीं लगी लुगाई हाथ
अखबार बाँचता हूँ हर रोज
शायद मिल जाये अब
तेरी चच्ची का साथ.
© दीप्ति शर्मा —


Comments

expression said…
:-)
अच्छा तो मेट्रिमोनियल पढते थे चच्चा...

अनु
kshama said…
Ye bhee khoob rahee!
hahahahhahahahaha......है अब भी एक चची की दरकार ....बढिया है लगे रहो :)))
yashoda agrawal said…
आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 12/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!
Saras said…
उम्मीद पर दुनिया कायम है ...चच्चाजी लगे रहिया ...:)
Rohitas ghorela said…
आपने इस रचना का अंत बड़ी कसमकस में समेट लिया ... :D :P

आभार !! बेतुकी खुशियाँ
:):) हमारी भी दुआएं शामिल हैं ... मिल जाए चच्ची का साथ

शायद मिल जाए अब तेरी चच्ची का साथ …
हा हा हा
:)

क्या बात है दीप्ति जी
इस बार तो हास्य कविता !
रंग जमा दिया …
:)

शुभकामनाओं सहित…
राजेन्द्र स्वर्णकार


…और , आपकी प्रतीक्षा है मेरे ब्लॉग की ताज़ा पोस्ट पर
#
12-12-12 के अद्भुत् संयोग के अवसर पर
लीजिए आनंद ,
कीजिए आस्वादन
वर्ष 2012 के 12वें महीने की 12वीं तारीख को
12 बज कर 12 मिनट 12 सैकंड पर
शस्वरं पर पोस्ट किए
मेरे लिखे 12 दोहों का

:)

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !