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मैं कद्र करती हूँ

एक ऐसा इंसान जो सच के लिये जीता हो... त्याग,
सदभावना में विश्वास हो..
मैं भी एक ऐसे इंसान को जानती हूँ
सच में ऐसे लोग बहुत कम होते हैं..
कुछ पंक्तियाँ मेरी तरफ से..
वो आत्मविश्वास जिससे
खुद आगे बढ़ते जाये
तलाश ले मंज़िल
उन हौसलों की जो
अत्यधिक अटूट हैं
मैं कद्र करती हूँ ।
अकेले चलने का हुनर
उज्जवल भविष्य को सोच
निरंतर आगे बढ़ने की
उत्सुकता जो प्रेरक है
उस प्रेरक प्रयास की
मैं कद्र करती हूँ ।
खुद को भी भुला दे
जो कभी डगमगाये
तो सम्हल जाये और
हिम्मत ना हारे
उस विश्वास की
मैं कद्र करती हूँ ।
मदद कर दूसरो की
सबको हँसा खुद भी मुस्कुराए
हालातों से डटकर बस
वो लड़ता जाये
उस विशाल हृदय की
मैं कद्र करती हूँ ।
गर्व से नतमस्तक हूँ
प्रयासों से गदगद
अब क्या कहूँ
शब्द ही नहीं हैं
बस उस इंसान की
मैं कद्र करती हूँ ।
©दीप्ति शर्मा

Comments

भावो का सुन्दर समायोजन......
yashoda agrawal said…
आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 29/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

पिता

पिता
मेरी धमनियों में दौड़ता रक्त
और तुम्हारी रिक्तता
महसूस करती मैं,
चेहरे की रंगत का तुमसा होना
सुकून भर देता है मुझमें
मैं हूँ पर तुमसी
दिखती तो हूँ खैर
हर खूबी तुम्हारी पा नहीं सकी
पिता
सहनशीलता तुम्हारी,
गलतियों के बावजूद माफ़ करने की
साथ चलने की
सब जानते चुप रहने की
मुझे नहीं मिली
मैं मुँहफट हूँ कुछ,  तुमसी नहीं
पर होना चाहती हूँ
सहनशील
तुम्हारे कर्तव्यों सी निष्ठ बन जाऊँ एक रोज
पिता
महसूस करती हूँ
मुरझाए चेहरे के पीछे का दर्द
तेज चिड़चिड़ाती रौशनी में काम करते हाथ
कौन कहता है पिता मेहनती नहीं होते
उनकी भी बिवाइयों में दरार नहीं होती है
चेहरे पर झुर्रियां
कलेजे में अनगिनत दर्द समेटे
आँखों में आँसू छिपा
प्यार का अथाह सागर
होता है पिता
तुम
सागर हो
आकाश हो
रक्त हो
बीज हो
मुझमें हो
बस और क्या चाहिए
पिता
जो मैं हू-ब-हू तुमसी हो जाऊँ ।__ Deepti Sharma
मैं चीख रही ,
मेरा लहू धधक रहा
कहीं सड़क लाल तो
कहीं बदरंग हो रही
पर ना बिजली चमकी
ना बरसात हुई
ना आँधी आयी
आयी तो उदासी
बस नसीब में मेरे
सुन ख़ुदा !
तू बहरा हो गया क्या ?
-दीप्ति शर्मा