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दीवाना




दीवाना  जिसे हम कहते हैं 
दीवाना सही पर है वो क्या 
आखिर क्यूँ ये जमाना 
दिल वालो को 
दीवाना कहता है 
दीवाने की पहचान है क्या
हम किसे दिवाना कहते हैं 
दिवाना जिसे हम कहते हैं
 दिवाना सही पर है वो क्या 

वक़्त वो लम्हा है कौन सा 
जब ये दीवाने आते हैं 
दिखते कैसे  चलते कैसे 
इनकी कुछ पहचान तो दो 
कोई आके इस दिल को बताये 
की कैसे  ये दीवाने होते हैं
दीवाना  जिसे हम कहते हैं 

दीवाना सही पर है वो क्या 
ये मैने तब लिखा जब मैं ८ क्लास में थी तब मुझे कविता का मतलब भी ठीक से पता नही था
पर जो दिल ने कहा लिख दिया पर आज मैं आप सब को वो जरुर पढाना  चाहूंगी 


- दीप्ति 

Comments

अच्छी रचना ... दीप्ति...
Coral said…
बहुत सुन्दर .... ८ क्लास यकीन नहीं आ रहा है !
amar jeet said…
आपकी कविता पड़कर मुझे भी अपने दौर शायद मै उस समय 9 वी क्लास में पड़ता था लिखी कविता याद आ गयी !
अक्सर वह अपने भवन की छत पर खडी रोज मुझे निहारती है
मै भी उसकी और इस आस से देखता हु की
आज वह कुछ बोलेगी
दिल में छुपे राज खोलेगी
परन्तु अफ़सोस रोज की ही तरह
सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम हो गयी
दिल की बात दिल में ही रह गयी
किन्तु एक आस छोड़ गयी की
कल फिर वह छत पर आएगी
मुझसे नजरे मिलाएगी
मै भी उसकी और इस आस से देखूंगा की
वह आज कुछ बोलेगी
सालो छुपे दिल के राज खोलेगी !.....................
mahendra verma said…
कक्षा 8 के समय की रचना है , तब तो वाकई प्रशंसनीय है।
mahendra verma said…
कक्षा 8 के समय की रचना है , तब तो वाकई प्रशंसनीय है।
सुधीर said…
होनहार बिरवान के होत चीकने पात। उस उम्र में इतना अच्छा लिखा।
दीप्ति जी,

शुक्र है आपने आखिरी में बता दिया क्योंकि पूरी रचना में परिपक्वता की कमी दिख रही थी.........वैसे आप अब इसमें सुधार करके प्रकाशित करती, तो शायद कुछ ज्यादा बेहतर लगता........वैसे अब आप कौन से क्लास में हैं ?????
@अमरजीत जी,

सच बताऊँ मुझे तो आपकी कविता बहुत अच्छी लगी|
vikas chaudhary said…
its nothing but the creation of ur mind,that comes uot from your heart naturaly.............fantastic
UNBEATABLE said…
Seedhe saral shabd aur itanee chhoti umra mei bhi vicharon ka itana sundar chitran .... Bahut Khoob ...
इमरान अंसारी ji mai abhi b.tech 3rd year mai hu
mai kosis karugi ki aage koi galti na ho
aapka dhanyvad
डॉ॰ मोनिका शर्मा ji, Coral ji, aapka aabhar amar jeet ji aapki racna vakaye sundar hai
aapka aabhar
mahendra verma ji ,सुधीर ji , UNBEATABLE ji aapka aabhar
Sunil Kumar said…
bachpan ki kavita aisu to aage kya hoga shubhkamnaye
amar jeet said…
दीप्ती जी कभी हमारे ब्लॉग में भी पधारे...........कहना तो पड़ेगा ...........
ashish said…
ये कह दू की कविता अच्छी बनी है तो उचित नहीं होगा लेकिन जिस उम्र में ये रची गयी है उस हिसाब से परिपक्वता की आशा रखना भी बेईमानी होगी . अच्छा लिखतीहो
sundar rachna...shabd mayne nahi rakhte mukhya cheej to man ke bhaw hai ..jo nishchit hee bahut sundar hai ..wo bhee jab aap class 9 me thee...badhayi
ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति, मुबारकबाद।
दीपावली की शुभकामनाओं के साथ इस प्यारी रचना के लिए ढेरों बधाई
anklet said…
realy nice & wish u a happy diwali and happy new year
bb said…
This comment has been removed by the author.
anubhav said…
realy nice yaar ,,, you are so sweet

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
अभी कुछ देरपहले
मुझे आवाज़ आयी
माँ , मैं यहाँ खुश हूँ
सब  बैखोफ घूमते हैं
कोई रोटी के लिये नहीं लड़ता
धर्म के लिये नहीं लड़ता
देश के लिये,
उसकी सीमाओं के लिये नहीं लड़ता
देखो माँ
हम हाथ पकड़े यहाँ
साथ में खड़े हैं
सबको देख रहे हैं
माँ, बाबा से भी कहना
कि रोये नहीं
हम आयेगें फिर आयेगें
पर पहले हम जीना सीख लें
फिर सीखायेगें उनको भी
जिन्हें जीना नहीं आता
मारना आता है
माँ, आँसू पोंछकर देखो मुझे
मैं दिख रहा हूँ ना! 
हम सभी आयेगें पर तभी
जब वो दुनिया अपनी सी होगी
नहीं तो हम बच्चे
उस धरती पर कभी जन्म नहीं लेगें
तब दुनिया नष्ट हो जायेगी
है ना! 
पर उससे पहले
माँ, बाबा आप
यहाँ आ जाना हमारे पास
हम यहीं रहेगें
फिर कोई हमें अलग नहीं करेगा
तब तक के लिये तुम मत रोना
हम सब देख रहे हैं
और मैं रोते हुए चुप हूँ
बस एक टक देख रही हूँ
तुझे बेटा
तेरे होने के अहसास के साथ
©दीप्ति शर्मा