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ऐसा एक संसार बनाऊं

ऐसा एक संसार बनाऊं ,
ना हो जहाँ गम का अँधियारा |

हर इंसा को मिले जहाँ ,
कश्ती का हर किनारा ,
महफ़िलें तो हो बहुत पर,
गम का ना नामों निशाँ हो ,
ऐसा एक संसार बनाऊं ,
ना हो जहाँ गम का अँधियारा |

मुश्किलें मिल जाये कहीं तो ,
आसाँ हो जाये ये रास्ता तुम्हारा ,
अरमाँ हो  पूरे दिल के सभी ,
और खिल जाये मुस्कान से ,
वो खुशनुमा चेहरा तुम्हारा|
ऐसा एक संसार बनाऊं ,
ना हो जहाँ गम का अँधियारा |
- दीप्ति 

Comments

सुंदर प्रस्तुति....

नवरात्रि की आप को बहुत बहुत शुभकामनाएँ ।जय माता दी ।
दीप्ति जी,
बहुत ही खूबसूरत एवं बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।
aapko bhi navratri ki subhkamnaye
dhanyvad
नवरात्रि की शुभकामनायें ...सुन्दर ख्वाब
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.......बधाई........इसे पढ़कर किशोर दा' का वो सदाबहार गीत याद आ गया ........"आ चल के तुझे मैं ले के चलूँ एक ऐसे गगन के तले".
जिंदा दिल लोग उमीदों के तराने कड़ी मुश्किलों के दौर में गाये जाते हैं.... बस कुछ ऐसी ही कविता है. बहुत खिली हुई.
जिंदादिली से भरपूर बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति..बधाई...
संगीता स्वरुप ( गीत )ji aako dhanyvad
इमरान अंसारी ji mujhe achha laga jo aapko mrei kavita padke kuch yad aaya
dhanyvad
Kishore Choudhary ji jab kabhi muskil dor ho to yuhi khele rahna chahiye
mera to yahi manna hai
aapka dhanyvad
दीप्ति जी,
बहुत ही खूबसूरत एवं बेहतरीन अभिव्‍यक्ति
Sunil Kumar said…
ummid hai pura hoga , sapna aapka badhai
संजय कुमार चौरसिया ji dhanyvad
sahi kaha kas y sapna sach ho jaye
Sunil Kumar ji aapka blog mai aane ko dhanyvad
ehsas said…
kash ye sapna sach ho jaye
duniya se andhkar mite
dil se dil milte rahe
nafrat ki diwar hate
ehsas said…
This comment has been removed by the author.
mai bhi yahi sochti hu par kya kabhi yesa hoga?
ehsas ji blog mai aane ko aapka aabhar
बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति दोस्‍त
धन्यवाद
aapka aabha जयकृष्ण राय तुषार ji
नये जोश और आशाओं का संचार करती एक अच्छी कविता दीप्ती जी। कभी की लिखी ये पंक्तियाँ याद आ गयी-

रोज मैं गीत नया गाता हूँ
सोने वाले को जगाता हूँ
आँधियाँ आती जाती रहती है
दीप को दीप से जलाता हूँ।

सादर
श्यामल सुमन
www.manoramsuman.blogspot.com
aapka aabhar श्यामल सुमन ji
kripya yuhi aate rahiye
Udan Tashtari said…
बहुत सुन्दर रचना, अच्छी लगी.
love said…
nice picture on front and aap nice likhate ho

my blog name is www.onlylove-love.blogspot.com

if u free so visit it
monali said…
Lovely poem.. :)
UNBEATABLE said…
Jeevan ke prati tumhaarii Sakratmak Soch ki abhivyakti hai yeh Kavita ... Bahut Bahut Badhaayii
UNBEATABLE ji aapka dhanyvad
aap aaye achha laga
POOJA... said…
kaash aisa jaha ban sake... too good...
डॉ. मोनिका शर्मा ji aapka aabhar
M VERMA said…
आशावान और सुन्दर रचना...
amar jeet said…
बहुत सुंदर प्रस्तुती अच्छा लगा पड़कर वैसे ऐसी कोई कालोनी बन रही हो तो कृपया 1000 -2000 स्केयर फीट की जगह हमें भी दिला दीजियेगा अमन चैन वाली जगह आज कल मिलती कहा है !
ha bilkul amar jeet ji agar mujhe pata lagta hai ki yesi koi jagah hai to mai apko jarur bataugi
aapka aabhar
सुधीर said…
आपको बहुत-बहुत बधाई। बहुत ही सुंदर कविता।
http://sudhirraghav.blogspot.com/
dhanyavad राकेश कौशिक ji
सीधे-सादे शब्दों में रची गई सार्थक रचना!
--
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ji aapka aabhar
or aapko bhi vijaydashmi ki hardik subhkamnaye
ALOK KHARE said…
bahut a anutha/ khayall he kavita me
sabhi ke liye khushnuma sansaar

kammal he

badhai kabule

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !