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गम

जीना है सीखा इस गम से ,
पीना है सीखा इस गम से ,
हम हैं गम से 
गम हैं हम से |
ये जो जिंदगानी है हमसे ,
और मोहब्बत है तुमसे |
खुशिया हैं जो तुमसे 
वो डूब गयी मेरे गम से |
                                
- दीप्ति 

Comments

Coral said…
पहली बार तुम्हारे ब्लॉग में आई हूँ ... रचनाएँ बहुत अच्छी लगी !
sunder kavita,dil ke bhawon ko apane behtareen andaz mai bayan kiya hai.
ehsas said…
Dipti ji...... gum hai to zindgi hai gum nahi to kuch bhi nahi. lazabab abhivaykti
गहरे भाव समेटती हुई रचना है.
@SHIVAM@!!!!!!! said…
mujhe pata hai tumhare a9dar jo adhut kala hai wo god gifted hai..................
aur mujhe tumhari sahi poemsit9i accchi lagti hai jisse mai shavdo mai 9ahi vata sakta ................tumhari poems mai wo feeli9gs hai jo kisi aur ke mai 8ahi....
ashish said…
गम और ख़ुशी , जिंदगी के दो रूप है , गम से बाहर निकलो खुशिया दामन फैलाये इंतजार कर रही है . अच्छी कविता .
बहुत अच्छी लगी
Shekhar Suman said…
बहुत ही ख़ूबसूरत रचनायें हैं..
आता रहूँगा....
UNBEATABLE said…
Mauhabat aur gam ka saath kitana sundar chitran kiya hai ..... Sundar .... bahut Sundar
bahut khoob deepti... achhi lagi tumhari yeh rachna bhi....
दीप्ती जी,

शब्दों में कंजूसी करते हुए भी शानदार रचना है....हम-ग़म का तालमेल अच्छा लगा....शुभकामनाये|
amar jeet said…
बहुत अच्छी और सुंदर अभिव्यक्ति आशा और निराशा के बीच घुमती कविता इसे भी पड़े ..........सब को खुश करने के चक्कर में, जाने क्या क्या दर्द सहे
कहने को तो कह सकते थे लेकिन हम खामोश रहे
ख़ामोशी वो क्या समझेंगे जो जलसों के भूखे है
आंसू तो पवित्र है सभी के होंठ झूठे है......
इस पर भी न जाने क्यों लोग हमी से रूठे है
Coral जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
संजय भास्कर जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
ehsas जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
ashish जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
Vijay Pratap Singh Rajput जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
Shekhar Suman जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
UNBEATABLE जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
डॉ. मोनिका शर्मा जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
संजय कुमार चौरसिया जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
इमरान अंसारी जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
amar jeet जी आपका धन्यवाद मेरा प्रोत्साहन करने को आभार
बहुत सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति...
Udan Tashtari said…
बहुत सुन्दर!!
amar jeet said…
आपकी रचनाओ में छिपी अनछिपी बातो के आलावा उन सभी के कमेंट्स प्रति जो आभार व्यक्त करने का तरीका है वो आत्मीयता से भरा होता है ! आभार व्यक्त करने के लिए धन्यवाद कृपया इस पर धन्यवाद न दीजियेगा !
सुधीर said…
बेहतरीन!!!!!!!!!
Amit K Sagar said…
मुझे कुछ ख़ास मजा नहीं आया.
पर लिखती रहें यकीनन बेहतर रचनाएं आपसे निकलेगीं!
Sunil Kumar said…
ख़ूबसूरत रचनायें हैं..
bahut hee bhawuk rachna ..dil ko chhoo gayi...
एक कबूतर (री), उसका गमज़दा दिल और आपका झुका हुआ सिर, कोई पीठ किये जाती हुई युवती और शराब के दो भरे गिलास (इनमें से एक भी खाली नहीं हैं)....ये सब कुछ आपके गम को बयां करने के लिए काफी हैं....कुल मिलाकर आपका पेश करने का तरीका बहुत कुछ हकीकत जैसा और उम्दा है....हमारी पूरी सहानुभूति है आपके साथ.....ईश्वर आपके इस ग़म को ज़ल्द दूर करे यही हमारी दिली दर्ख्वाष्ट है उससे.....

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
अभी कुछ देरपहले
मुझे आवाज़ आयी
माँ , मैं यहाँ खुश हूँ
सब  बैखोफ घूमते हैं
कोई रोटी के लिये नहीं लड़ता
धर्म के लिये नहीं लड़ता
देश के लिये,
उसकी सीमाओं के लिये नहीं लड़ता
देखो माँ
हम हाथ पकड़े यहाँ
साथ में खड़े हैं
सबको देख रहे हैं
माँ, बाबा से भी कहना
कि रोये नहीं
हम आयेगें फिर आयेगें
पर पहले हम जीना सीख लें
फिर सीखायेगें उनको भी
जिन्हें जीना नहीं आता
मारना आता है
माँ, आँसू पोंछकर देखो मुझे
मैं दिख रहा हूँ ना! 
हम सभी आयेगें पर तभी
जब वो दुनिया अपनी सी होगी
नहीं तो हम बच्चे
उस धरती पर कभी जन्म नहीं लेगें
तब दुनिया नष्ट हो जायेगी
है ना! 
पर उससे पहले
माँ, बाबा आप
यहाँ आ जाना हमारे पास
हम यहीं रहेगें
फिर कोई हमें अलग नहीं करेगा
तब तक के लिये तुम मत रोना
हम सब देख रहे हैं
और मैं रोते हुए चुप हूँ
बस एक टक देख रही हूँ
तुझे बेटा
तेरे होने के अहसास के साथ
©दीप्ति शर्मा