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अनकही बातें


                                                                        


(मेरे नए ब्लॉग पर पहली रचना )
अनकही बातें जो दिल कहे
बस कह दीजिये यहाँ
दिल में उठे हर ज़ज्बात

वो बातें जो कहीं ना हों 
बस महसूस की गयी हो 
वो अनकही बातें 

आँखों के पलछिन में
छुपी कुछ आहटें 
वो अनकही बातें 

उम्मीद सभी की ले 
कह गयी मैं यहाँ 
वो अनकही बातें |

- दीप्ति शर्मा 
http://deepti09sharma02.blogspot.com/


Comments

Anonymous said…
aapko naye blog ke liye subhkamnaye
kshama said…
Bahut pyaree rachana!
बहुत उम्दा आज़ ब्लाग4वार्ता में चर्चा है.. इस पोस्ट की
कुछ बातें कभी-कभी अनकही ही रह जाती हैं|
रेखा said…
बहुत सुन्दर रचना . नए ब्लॉग की पहली रचना के लिए बधाई
कहने के पहले लिख लीजिये अनकही बातें।
Dorothy said…
खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.
अनकही बातो ने बहुत कुछ कह दिया है .. शब्द मुखर हो उठे है .. बधाई

आभार
विजय
-----------
कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html
SUNDER ABHIVAYKATI. CONGRATES. DEV

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !