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ये कैसी रौशनी

जब  कभी  हम बहुत दूर जाना चाहते हैं  और बिना सोचे चल देते हैं  तो कभी उसका परिणाम भयावह भी हो सकता है 
इसे कविता तो नहीं कहुगी पर ये वो  शब्द  हैं जो मेरे दिल ने कहे....
दूर  जहाँ रौशनी थी ,
कदम बढाये थे उसने ,
हौसला  भी तो  था|
था  उल्लास  इतना कि ,
सब  भूल पहुँचाना
चाहती थी  वो तो,
उस रौशनी तक |
डगमगा रहे थे कदम 
ना जाने कितनी ,
दूर हो मंजिल |
बस एक आभास,
ही तो था उस  रौशनी  ,
के दूर होने का|
जो अपने पास ,
उसे बुलाती थी\
उमंग थी उसे उस
रौशनी मे समा जाने की|
उसके आगोश मे 
लिपट जाने की |
दर्द झेल सामना ,
किया था मुस्किलो का,
पहुँचने को रौशनी   तक\
आखिर पहुच गयी ,

उस रौशनी तक 
अपनी मंजिल समझ |
नादाँ थी  लगा था 
एक वही मंजिल है
जब पहुंची उसकी ,
गिरफ्त मे तो जाना 
वो कोई रौशनी  नही ,
वो तो आग थी\
जिसने बैखोफ  उडती हुई
उस चिड़िया के पंख 
को ही जला दिया|
उसे पहुँचाना तो था 
अपनी मंजिल तक 
पर  रौशनी  की चाह,
मे वो पंख फेला ,
अंधकार मे पहुँच गयी |
वो अंधकार जहाँ 
से लौट  के  आना 
मुमकिन ही नहीं,
रौशनी  की चाह मे 
जो बढाये थे कदम  
वो कदम  ही उसे  
मौत के आगोश  मे  ले गए|
  दीप्ति-शर्मा

Comments

ज़िन्दगी से सबक ऐसे ही मिलते हैं. सपनों की उड़ाने आसमानों में उतनी कलरफुल नहीं लगती... भूला क्या जायेगा जीया हुआ, या सोचा हुआ... कुछ भी नहीं, कभी देर तक उदास बैठने के बाद कोई सबब याद नहीं आएगा कि चलो उठ कर कुछ दूर घूम आते हैं देखते है कि क्या दुनिया वहीं ठहरी हुई है ?
UNBEATABLE said…
प्रथम भाग में आशा से भरपूर और उर्जा से स्फूर्त आशा की किरण सा एहसास हुआ ... साथ ही कविता के दुसरे भाग में जीवन की सचाई और वास्तविकता से सामना हुआ ... बहुत अच्छा लिखा है तुमने ... साथ ही कहूँगा की अगर कविता की समाप्ति पुनः एक आशा के सन्देश के साथ होती तो मुझे व्यक्तिगत तौर पर और पसंद आती .... अच्छे लेखन के लिए बधाई
Avinash Chandra said…
ईमानदारी अच्छी लगी आपकी..
गिरना सिर्फ गिरना नहीं, घोतक है इस बात का कि चलने का यत्न हुआ था.

Keep it up!
achhi kavita ... ek poori yatra hai ,,jisme urjaa bhi hai ..urja ka hraas bhi hai ... bahut achhe
Deepti Sharma said…
Kishore Choudhary ji,UNBEATABLE ji,Avinash Chandra ji ,स्वप्निल कुमार 'आतिश'ji
aap sab ko dhanyvad
aapne mera margdarsan kiya
kripya yuhi mera margdansan karte rahiye dhanyvad
ashish said…
मै शब्द ढूंढ़ रहा हूँ . सुन्दर अभिव्यक्ति .
बहुत अच्छी लगी यह अभिव्यक्ति ....ज़िंदगी में बहुत बार लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया ..पर हौसला फिर प्रेरित कर्ता है आगे बढने के लिए ....

चर्चा मंच पर आने और ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया
Deepti Sharma said…
ashish ji, sangeeta ji aapka aabhar
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है दीप्ति..... ऐसे ही लिखती रहें... शुभकामनायें
mridula pradhan said…
bahot achchi likhi hai.
बहुत ही सुन्दर कविता ..अपनी कमी को जानना सुधार की पहली सीढ़ी है ..अच्छी प्रस्तुती के लिए बधाई ...स्वागत के साथ
vijayanama.blogspot.com
Deepti Sharma said…
विजय कुमार वर्मा जी , मृदुला प्रधान जी, डॉ मोनिका शर्मा जी
आपका आभार
यूँ ही अपना आशीष देते रहिये
धन्यवाद
इतने लोगों के बधाई संदेश और प्रशंसा ही बता रही है आपके काव्‍य की गुणवत्‍ता के बारे में ।

मैं मूक प्रशंसक बनना ही अच्‍छा समझ रहा हूँ ।।
प्रिय दीप्ति जी
रचना से रूबरू होने के आमंत्रण के लिए आभार !
अच्छे भावों को पिरो कर काव्यमाला का रूप दिया है …

जीवन में बहुत बार सोचते कुछ हैं , होता कुछ और है ।
कई बार हम से फ़ैसले ग़लत ले लिए जाने के कारण भी सही नतीज़े नहीं मिलते ।

आपका जीवन सुखद् स्वप्न और मुस्कुराती गुनगुनाती कविता बने…!
शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार
आनंद पांडे जी , राजेंद्र स्वर्णकार जी
आपका आभार
धन्यवाद
mridula pradhan said…
This comment has been removed by the author.
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है दीप्ति ji..... ऐसे ही लिखती रहें... शुभकामनायें
muskan said…
बहुत सुंदर...

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
अभी कुछ देरपहले
मुझे आवाज़ आयी
माँ , मैं यहाँ खुश हूँ
सब  बैखोफ घूमते हैं
कोई रोटी के लिये नहीं लड़ता
धर्म के लिये नहीं लड़ता
देश के लिये,
उसकी सीमाओं के लिये नहीं लड़ता
देखो माँ
हम हाथ पकड़े यहाँ
साथ में खड़े हैं
सबको देख रहे हैं
माँ, बाबा से भी कहना
कि रोये नहीं
हम आयेगें फिर आयेगें
पर पहले हम जीना सीख लें
फिर सीखायेगें उनको भी
जिन्हें जीना नहीं आता
मारना आता है
माँ, आँसू पोंछकर देखो मुझे
मैं दिख रहा हूँ ना! 
हम सभी आयेगें पर तभी
जब वो दुनिया अपनी सी होगी
नहीं तो हम बच्चे
उस धरती पर कभी जन्म नहीं लेगें
तब दुनिया नष्ट हो जायेगी
है ना! 
पर उससे पहले
माँ, बाबा आप
यहाँ आ जाना हमारे पास
हम यहीं रहेगें
फिर कोई हमें अलग नहीं करेगा
तब तक के लिये तुम मत रोना
हम सब देख रहे हैं
और मैं रोते हुए चुप हूँ
बस एक टक देख रही हूँ
तुझे बेटा
तेरे होने के अहसास के साथ
©दीप्ति शर्मा