क्यूँ दर्द समझ कर भी, नासमझ बना करते हैं| वो पत्थर के रोने को झरना कहा करते हैं और उसे देख के हँसते हैं | खलिश दबा सीने में तन्हा जीया करते हैं , तमन्ना नही कोई बस में जान के हर अश्क का अफ़सोस किया करते हैं, वो पत्थर के रोने को झरना कहा करते हैं और उसे देख के हँसते हैं| तस्कीरे बना हर इल्ज्म को अधिकार दिया करते हैं, दिल के जख्मो को जो नकार दिया करते हैं, इंसानों के आंसू को देखा भी नही करते हैं, वो पत्थर के रोने को झरना कहा करते हैं, और उसे देख के हँसते हैं | - दीप्ति शर्मा
Comments
हर शब्द में गहराई
हर पंक्ति अपने आप में एक कविता सी है
बहुत खूब
शुभकामनाएँ
खयालों को नींदों में सपने बनाकर।
मेरे अश्क थे उसकी आंखों में गोया
वो बैठे हैं शायद जहन में समाकर
दीप्ति ,
बधाई !
टिप्पणी करने चला तो आपकी कविता को ही लिख बैठा थोड़ा सा घुमाकर।
इजाजत है न ?
नमस्कार !
आपकी कुछ रचनाएं पढ़ी हैं , अच्छे प्रयास कर रही हैं ।
और श्रेष्ठ लिखने की शुभकामना के साथ मेरी चंद पंक्तियां आपके लिए …
दूसरों के अश्क… अपनी आंख से बहने भी दे !
अपने दिल को… दूसरों के दर्द तू सहने भी दे !
दुनिया दीवाना कहे… तुझको , तू मत परवाह कर ;
रास्ते अपने तू चल… कहते , उन्हें कहने भी दे !!
- राजेन्द्र स्वर्णकार
mujhe yese hi protsahan dete rahe
dhanybad
नमस्कार !
आपकी कुछ रचनाएं पढ़ी हैं ,
आप बहुत अच्छा लिखती हैं और गहरा भी.
बधाई.
पर जाने कहाँ चाकी जाती है हमें रुलाकर
आप की कविता में सच्चाई है
RINKU DADA (pRADIP dubey)
बेहतरीन अभिवयक्ति..........