मैं ना समझ सकी

ये कैसा जीवन है, मैं ना समझ सकी |
हूँ अपनों के साथ से जिन्दा पर क्यों?
उनके रहते तन्हा हूँ ,मैं ना समझ सकी |

सब कुछ जान  रही पर खामोश हूँ ,
हैरान  हो दुनिया के रुख को  देख,
अपने ख्वाबो को भी, मैं ना समझ सकी |

उलझने ना थमती हैं ना रूकती  हैं ,
इन उलझनों के भंवर में फंसी,
उन अडचनों को भी मैं ना समझ सकी |

फिरती हूँ  अपनी आँखों मे आंसू लिए ,
दुनिया मे क्या कीमत है इन आंसुओ की
ये दुनिया मे रह मैं ना समझ सकी |
- दीप्ति शर्मा 

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