उफ़...
 देह की टूटन
 तपता बदन
कसैली जीभ
और वो पोटला
नीम हकीमों का
मुँह बिचकाकर जो खा भी लूँ
तो वो
हिदायती मिज़ाज़ लोगों का
उफ़..
अब इस बुखार में
थकी देह की सुनु
या खुराक से लडूं
या हिदायती लोगों से...
 उफ़...
© दीप्ति शर्मा

Comments

वाह बहुत खूब
बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
कभी यहाँ भी पधारें

Popular posts from this blog

बस यूँ ही

डायरी के पन्नें

मैं