वो

एकांत में एकदम चुप 
 कँपते ठंडे पड़े हाथों को
 आपस की रगड़ से गरम करती
 वो शांत है 
 ना भूख है
 ना प्यास है
 बस बैठी है 
उड़ते पंछीयों को देखती 
घास को छूती
 तो कभी सहलाती 
और कभी उखाड़ती है
 जिस पर वो बैठी है 
 उसी बग़ीचे में 
जहाँ के फूलों से प्यार है
 पर वो फूल सूख रहें हैं
 धीरे धीरे फीके पड़ रहें हैं
 उनके साथ बैठकर
 जो डर जाता रहा 
अकेलेपन का 
अब फिर वो हावी हो रहा है
 इन फूलों के खतम होने के साथ
 ये डर भी बढ़ रहा है 
फिर कैसे सँभाल पाएगी
 वो इन कँपते हाथों को,
 लड़खड़ाते पैरों को 
 इन ठंडे पड़े हाथों की रगड़ भी 
 फिर गरमी नहीं दे पाएगी 
 वो भी मुरझा जायेगी
 इन फूलों के साथ । 

© दीप्ति शर्मा

Comments

yashoda Agrawal said…
आपने लिखा....
हमने पढ़ा....और लोग भी पढ़ें;
इसलिए बुधवार 04/09/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in ....पर लिंक की जाएगी. आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!
सुन्दर प्रस्तुति ....!!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (03-09-2013) को "उपासना में वासना" (चर्चा मंचःअंक-1358) पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
sushmaa kumarri said…
बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना....
Unknown said…
बहुत उम्दा रचना।
कभी यहाँ भी पधारें।
सादर मदन
http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
http://saxenamadanmohan.blogspot.in/
उम्र का अकेलापन ...ना जीने दे ...ना मरने दे

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