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मुझे याद करोगे


हर राह हर कदम
मेरे इंतज़ार में
थाम लोगे ज़ज़्बात
हर सहर में अपने तुम
मुझे याद करोगे ।
सूनी रातों में आँखों
में जो अश्क लाओगे
तो उदास चेहरे में तुम
मुझे याद करोगे ।
हर रात हर पहर
अनकहे अल्फाजों में
कुछ कहकर और
सब कुछ सहकर
तुम फरियाद करोगे
रोओगे और तुम
मुझे याद करोगे ।
वो अश्क जो मैंने बहाये
उनका क्या कभी
तुम हिसाब करोगे
हर पहर बस तुम
मुझे याद करोगे ।
बिसरी बातें याद कर
हर कठिनाई में
घुटने मोड़ बैठकर
चेहरे को ढक कर
जब तुम आह भरोगे
उस आह में भी तुम
मुझे याद करोगे ।
रेत पर अँगुलियाँ फिरा
थामना जो चाहोगे उसे
वो फिसल जायेगा और
उड़ती हवाओं को छूकर
उन हवाओं में भी तुम
मुझे याद करोगे ।
बहते पानी के साथ
जो आँसू बहाओगे
साथ चाहोगे जब
चलना किसी के
उस सफर मे जो हाथ,
किसी का साथ चाहोगे तो
मुझे याद करोगे ।
अब सोचा है मैंने
ना कोई सुबह मेरी
ना कोई शाम है
पर हर सुबह शाम
मेरी ही बात करोगे
धड़कनों के थमने तक
हर एक साँस में तुम
मुझे याद करोगे ।
अकेले होगे जब
तंहाई के पास में
मुँह मोड़ लेंगे जब
अपने ही तूफ़ान में
उन अपनों के बीच
हर गिले याद करोगे
उन फालसों में तुम
मुझे याद करोगे
बस मुझे याद करोगे ।
© दीप्ति शर्मा

Comments

Akhilesh Dubey said…
कबीर साहब ने लिखा,"प्रेम गली अति साँकरी तामें दो न समाय"फिर कौन याद करने वाला और कौन यादों में आने वाला?
बहुत खूब
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !