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गुलाम हूँ मैं पीढ़ियों से..


रोज की तरह आज भी सूरज अस्त हो गया
और आँखमिचोली करता
उसी पहाड़ी के पीछे छुप गया,
वो परछाईं भी तो धुँधली सी पड़ गयी है या शायद
मेरी नजर,
एक वक्त के बाद
पर वो आवाज़ अब भी गूँजती है
वहाँ मेरे कानों में.... और तुम मुझसे
कहा करती थीं ना कि
" मुझे इस तलहटी से बहुत प्यार है एक दुनिया है
मेरी जिसमें जी भर जीना चाहती हूँ
पर जीने नहीं दिया जाता ।
पल पल सहमी हुयी डरी सी
सोचती हुई सवाल करती हूँ..
ये हिसाब शब्द किसने बनाया,
क्या जानते हो तुम ?
मुझे तो सांसों तक का हिसाब देना पड़ता है ।
मेरी भी अपनी दुनिया है भले
ही आभासी क्यों ना हो,
जिसमें मैं जीना चाहती हूँ .. खुश रहना चाहती हूँ ।
विक्षिप्त सी मैं रोज आँखें खोलती हूँ
जीने की उम्मीद में नहीं अपितु कुछ अलग, कुछ
नया करने की चाह में..
जो मुझे खींच लाती है यहाँ इस
पहाड़ी की तलहटी में... ।
जहाँ आकर कुछ सुकुन सा पाती हूँ
वो दूर गिरता झरना कुछ अलग प्रमाद भर देता है मेरे
भीतर,
तो लगने लगता है
मेरी दुनिया, मेरे सपने मेरे हैं बस मेरे
और अगले ही पल सब बिखर जाता है...
कैसे मेरे सपने मेरे हो जायेंगे..
मैं लड़की हूँ.... गुलाम हूँ पीढ़ियों से... मनुष्य
की मानसिकता के आगे लाचार.. "
यही कहते तुम रो पड़ी थीं
और अपनी सी दुनिया में फिर वापस आने
का वादा कर
तुमने जो आँखें बंद की
तो अब तक नहीं खोली ।
और मैं आज भी उस तलहटी में नदी किनारे
बस वही आवाज़ सुनने रोज आया करता हूँ...
देखो अब तो वही वक्त, वही समय
जैसा तुम चाहती थी सब वैसा ही है अब तुम
कहाँ हो ?
क्यों लौट कर नहीं आतीं..
लौट आओ ना!!!
एक वक्त के बाद लौट आने का तुमने
वादा जो किया था ।
.........................दीप्ति शर्मा

Comments

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन 'बंगाल के निर्माता' - सुरेन्द्रनाथ बनर्जी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
Ashok Khachar said…
बहुत सुन्दर .....
गहन अभिवयक्ति......
Yashwant Mathur said…
आज 08/008/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

वो रेल वो आसमान और तुम

रेल में खिडकी पर बैठी
मैं आसमान ताक रही हूँ
अलग ही छवियाँ दिख रही हैं हर बार
और उनको समझने की कोशिश
मैं हर बार करती
कुछ जोड़ती, कुछ मिटाती
अनवरत ताक रही हूँ
आसमान के वर्तमान को या
अपने अतीत को
और उन छवियों में
अपनों को तलाशती
मैं तुम्हें देख पा रही हूँ
वहाँ कितने ही पेड़,
बेंच, कुआँ, सड़क, नाला,पहाड़
निकलते चले जा रहे हैं
इन्हें देख लगता है
इस भागती जिदंगी में
कितने साथ छूटते चले गये
मन के कोने में कुछ याद तो है ही
अब चाहे अच्छी हो ,बुरी हो
और मैं उन्हें ढोती ,रास्ते पार करती
तुम्हें खोज रही हूँ
बहुत बरस बाद आज ,
मन के कोने  से निकल दिखे हो
वहाँ बादलों की छवियों में
और मैं तुम्हें निहार रही हूँ।

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा