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सिर्फ एक झूठ

आज डायरी के पन्नें पलटते हुये एक पुरानी कविता मिली....
लिजिये ये रही..
अगाध रिश्ता है सच झूठ का
सच का अस्तित्व ही
समाप्त हो जाता है
सिर्फ़ एक झूठ से ।
अपरम्पार महिमा है झूठ की
चेहरे से चेहरा छुप जाता है
इंसानों का ज़ज़्बा खो जाता है
सिर्फ एक झूठ से ।
अगण्य होते हैं पहलू
हर एक झूठ के
रिश्ते भी तोले जाते हैं
सिर्फ एक झूठ से ।
अक्त हुयी कोई बात
उभर के ना आ पाये
यही उम्मीदें होती हैं
सिर्फ एक झूठ से ।
कहानी खूब सूनी होंगी
सूनी कभी झूठ की कहानी
कभी सच भी हार जाता है
सिर्फ एक झूठ से ।
अनगिनत सवाल होते हैं
पर समाधान कोई नहीं
सवाल ठुकरा दिया जाता है
सिर्फ एक झूठ से ।
अनकहे अल्फाजों में
जो कुछ बातें रह जाती हैं
उनका वजूद खो जाता है
सिर्फ एक झूठ से ।
© दीप्ति शर्मा

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मैं

दिल में उठे हर इक 
सवाल की भाषा हूँ |
सिमटे हुए अहसासों को  जगाने की अभिलाषा हूँ |
गहरा है हर जज्बात  जज्बातों से पलते  खवाब की परिभाषा हूँ |
अकेली हूँ जहाँ में पर  जगती हुई  मैं आशा हूँ |

- दीप्ति शर्मा

बताऊँ मैं कैसे तुझे ?

वो लम्हे हमें हैं अब याद आते , ना भूले हैं जानम ना भूल पाते ,बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो लहरों की कस्ती ,वो फूलो की वादी ,सितारों की झिलमिल ,कहाँ खो गयी ,बताऊँ मैं कैसे तुझे ?
वो चूड़ी की छनछन ,वो पायल की खनखन , कहाँ खो गयी ,बताऊँ  मैं कैसे तुझे ?
वो कोयल की कूंह कूंह ,वो झरने का झरना ,रिमझिम सी बारिश,कहाँ खो गयी ,बताऊँ मैं कैसे तुझे ?
फूलों की ख़ुशबू ,महकता वो आँगन ,मोहब्बत वो मेरी ,कहाँ  खो गयी ,बताऊँ  मैं कैसे तुझे ?

- दीप्ति 

चाहा था उन्हें

कसूर इतना था कि  चाहा था उन्हें
दिल में बसाया था उन्हें कि
मुश्किल में साथ निभायेगें
ऐसा साथी माना था उन्हें |
राहों में मेरे साथ चले जो
दुनिया से जुदा जाना था उन्हें 
बिताती हर लम्हा उनके साथ 
यूँ करीब पाना चाहा था उन्हें 
किस तरह इन आँखों ने
दिल कि सुन सदा के लिए 
उस खुदा से माँगा था उन्हें 
इसी तरह मैंने खामोश रह 
अपना बनाना चाहा था उन्हें |
-  दीप्ति शर्मा