एक परिधि में घूमते दो नाम
अपनी समान त्रिज्याओं के साथ
प्रतीक्षा -रत हैं
केन्द्र तक पहुँच
खुद के अस्तित्व को
एक दूसरे में समाने को ।
© दीप्ति शर्मा


Comments

त्रिज्याएँ त्रिजटा बने, हिम्मत पाए सीय |
बजरंगी नापें परिधि, होय मिलन अद्वितीय ||
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥
sundar rachna dipti ji
sushmaa kumarri said…
सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....
आपकी कविता में भावों की गहनता व प्रवाह के साथ भाषा का सौन्दर्य भी है .उम्दा पंक्तियाँ

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