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पेड़ के हरे पत्ते

देखा था कल गिरते
पेड़ के हरे पत्तों को
ना आँधी आयी कोई
ना पतझड़ का मौसम था
बस तड़पते सहते
रोते देखा था मैंने
पेड़ के हरे पत्तों को
आगे बढ़ना था उनको
विश्वास के साथ
कुछ पल जीने का
साथ ही तो माँगा था
पर तोड़ दिया उसने
जिससे साथ चल
जीने का सहारा माँगा था
मुरझाते देखा था मैंने
पेड़ के हरे पत्तों को
किसी की चाहत के लिये
डाल से अलग हो
जलते देखा था मैंने
पेड़ के हरे पत्तों को
©दीप्ति शर्मा



Comments

Rajendra Kumar said…
बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.
भावो को शब्दों में उतार दिया आपने.................
Deepti Sharma said…
Rajendra ji..... Sushma ji ... shukriya
Sadhana Vaid said…
मार्मिक एवं दिल को छूती हुई भावपूर्ण प्रस्तुति ! बहुत सुन्दर !

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !