यथार्थ के नीले गगन में
बह रहें हैं भाव मेरे
पीर परायी सुन सुनकर
दिल में उपजे हैं घाव मेरे
सुनो जरा क्या हुआ है देखो
तुम बन गये हो हमराज मेरे
मधुर गीत सुनकर तुम्हारे
गूँज उठे हैं राग मेरे
तराशा है खुद को तुम्हारे लिये
तुम बन गये हो अभिमान मेरे
©दीप्ति शर्मा
मेरी परछाई
वो कैसी आह की परछाई हैं मैंने खुद को लहरों मे डुबो, तूफानों से ये कश्ती बचायी है | जिस पर अब तक सम्भल मेरी जिंदगी चली आई है | हैं राहें कश्मकस भरी , अजनबी लोगो में रह किस तरह बात समझ पाई है | मुददत से अकेली हूँ मैं , तमन्नाये जीने की मैने तो ये बाजी खुद ही गंवाई है | वो गैरों के भरोसये शौक में आह में डूब ढलती हुई , फिरती वो मेरी ही परछाई है | - दीप्ति शर्मा
Comments
विजय दशमी की हार्दिक शुभ कामनाएँ!
अति सुन्दर...
:-)
ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ
♥(¯*•๑۩۞۩~*~विजयदशमी (दशहरा) की हार्दिक शुभकामनाएँ!~*~۩۞۩๑•*¯)♥
ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬●ஜ
:-)