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मैं कोई किस्सा सुनाऊँगी कभी

मैं कोई किस्सा सुनाऊँगी कभी
आँखो से आँसू बहाऊँगी कभी
तुम सुन सको तो सुन लेना
स्याह रात की बिसरी बातें
मैं तुम्हें बताऊँगी कभी
मैं फासलों को मिटाऊँगी कभी
मैं कोई किस्सा सुनाऊँगी कभी ।

खो गये हैं जो आँखों के सपन
मैं वो सपन दिखाऊँगी कभी
भूल गये हो जो तुम मुझे अब
मैं याद अपनी दिलाऊँगी कभी
मैं कोई किस्सा सुनाऊँगी कभी ।

जब तुम मेरे पास आ जाओगे
तुम्हें अपना बनाऊँगी कभी
जिंदगी के हर पन्ने को यूँ
बेनकाब कर हर लफ़्ज़ में
कुछ हालात बताऊँगी कभी
मैं कोई किस्सा सुनाऊँगी कभी ।
© दीप्ति शर्मा

Comments

किस्से शब्दों में बनने को तैयार हैं।
जब तुम मेरे पास आ जाओगे
तुम्हें अपना बनाऊँगी कभी
जिंदगी के हर पन्ने को यूँ
बेनकाब कर हर लफ़्ज़ में
कुछ हालात बताऊँगी कभी
मैं कोई किस्सा सुनाऊँगी कभी ।बहुत ही गहरे और सुन्दर भावो को रचना में सजाया है आपने.....
mridula pradhan said…
zaroor sunayega.....
yashoda agrawal said…
कल 05/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .

धन्यवाद!
Reena Maurya said…
बहूत हि सुंदर रचना है अंतिम पंक्तीया तो लाजवाब है...
बेहतरीन रचना....

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
मन से निकली,
मन तक पहुँची,
वो अनकही बात,
पर कैसे?
आँखों से पगली,
अब समझी ना !