वो

झटक कर जाती है जुल्फ़े
बड़ा इतराती है वो
क्या पता कितनों के
दिल पर कहर ढ़ाती है वो
जानते हैं ये जुल्फ़े उनकी नहीं
खरीद बाजार से घर पर
नकली जुल्फ़े लगाती है वो
देखो जरा
नकली जुल्फ़ों के दम पर
कितने ठुमके लगाती है वो
मत मरो ए दिवानों
इसकी अदाओं पर
अदाओं से ही घायल बनाती है वो
©दीप्ति शर्मा


Comments

Pallavi saxena said…
वाह क्या बात है!!! बहुत खूब एक अलग अंदाज़ की भावव्यक्ति....

Popular posts from this blog

डायरी के पन्नें

मैं

बताऊँ मैं कैसे तुझे ?