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जाना चाहती हूँ

                

मैं हूँ छोटी सी
पर अब बड़ी
होना चाहती हूँ |
उस मत्स्यालय
से बाहर निकल 
अपनी दुनिया में
जाना चाहती हूँ|
दिखावे के प्रेम
को त्याग कर
अपनी मर्जी से
जीना चाहती हूँ |            
अब मैं जी भर
तैरना चाहती हूँ
अपनी दुनिया में
जाना चाहती हूँ |
हैं मेरे अपने जहाँ   
हैं मेरी खुशिया वहां 
मैं उनके साथ
जीना चाहती हूँ |
कैद से आजाद हो
मैं उन अपनों से
मिलना चाहती हूँ 
मैं अपनी दुनिया में
जाना चाहती हूँ|

- दीप्ति शर्मा





Comments

Anonymous said…
bahut achhe
kaafi gambheer bhaw hain... badi ho gai ho sach me
सुंदर भाव। जो स्‍वयं को हर परिस्थितियों के अनुसार ढालना जानता है, उसे जीवन जीने की कला आ जाती है।
राजी खुशी कर दो विदा ...
Deepak Saini said…
सुन्दर कविता
sagebob said…
सुन्दर भाव.सुन्दर शब्द रचना.
सलाम.
Mithilesh dubey said…
सुन्दर भाव सुन्दर शब्द रचना.........
OM KASHYAP said…
bahut hi sunder sabdo ka sanklan
badhai
बहुत खूबसूरत रचना ...
kshama said…
Eeshwar kare aisaahee ho!Tumhari tamanna pooree ho!
दिखावे के प्रेम
को त्याग कर
अपनी मर्जी से
जीना चाहती हूँ |

सुन्दर भाव सुन्दर शब्द रचना.........
ashish said…
जीवन भरी इस कविता की हर पंक्ति सुन्दर लगी .
khubsurat bhaw!! pyari rachna!
दिल को छू गई आपकी रचना,बहुत बढ़िया.
Minakshi Pant said…
सुन्दर भावों की कल्पना को दर्शाती सुन्दर रचना |
बहुत खूब .. अपने anusaar jeena अच्छा lagta है ... apno के saath jeena भी कितना अच्छा होता है ..
बहुत सुन्दर रचना..अपनों के साथ जीना किसे अच्छा नहीं लगता..
UNBEATABLE said…
बहुत सुन्दर भाव के साथ .. कोमल रचना .... वास्तव में तुम्हारी भावनाए अब परिपक्व हो गयी है ... लाजवाब कविता
सुंदर भाव....एक अच्छी कविता..बधाई
बहुत सुन्दर भाव के साथ .. कोमल रचना ...
आप बहुत सुंदर लिखती हैं. भाव मन से उपजे मगर ये खूबसूरत बिम्ब सिर्फ आपके खजाने में ही हैं
ब्लॉग लेखन को एक बर्ष पूर्ण, धन्यवाद देता हूँ समस्त ब्लोगर्स साथियों को ......>>> संजय कुमार
आजादी का आह्वान .....
बहुत सुंदर भाव ......!!
sanjeev Sharma,NIC Delhi said…
Kya Baat hai Vastav mai kya creativity hai.really I liked it
sanjeev Sharma,NIC Delhi said…
Tumahari ye dono poem read kar ke bahut accha laga.
Manoj K said…
खूब .. बहुत सुन्दर कविता... अनंत में विचरने की इच्छा..

मनोज
ehsas said…
दिल से लिखी हुई एक दमदार रचना।
दिखावे के प्रेम
को त्याग कर
अपनी मर्जी से
जीना चाहती हूँ |

बेहतरीन रचना....
Kunwar Kusumesh said…
एक दमदार रचना.
सुन्दर भाव.लाजवाब कविता
उन्मुक्तता की आस।
Amit Tiwari said…
'मैं हूँ छोटी सी,
अब बड़ी होना चाहती हूँ.....'
सुन्दर भाव लिए हुए प्रेरक कविता है..
अच्छी रचना. बधाई स्वीकारें. अवनीश सिंह चौहान
crown said…
बहुत सुन्दर कविता...
arpit said…
मन को आल्हादित कर दिया आपकी इस रचना ने
उम्दा
amit-nivedita said…
wish you all the best ,,,god bless you..
bahut der se aapki kavitaye padh raha hoon, and i am really very impressed .

aap bahut acha likhti ho ,. badhayi sweekar kare.

-----------
मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
"""" इस कविता का लिंक है ::::
http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html
विजय
AJMANI61181 said…
हैं मेरे अपने जहाँ
हैं मेरी खुशिया वहां
मैं उनके साथ
जीना चाहती हूँ |
कैद से आजाद हो
मैं उन अपनों से
मिलना चाहती हूँ
मैं अपनी दुनिया में
जाना चाहती हूँ|

sunder abhivyakti dipti ji
बहुत-बहुत खूबसूरत रचना.......
बहुत खूबसूरत रचना ...Deepti ji keep it up.
jeevan singh said…
wow nice feeling.........

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
अभी कुछ देरपहले
मुझे आवाज़ आयी
माँ , मैं यहाँ खुश हूँ
सब  बैखोफ घूमते हैं
कोई रोटी के लिये नहीं लड़ता
धर्म के लिये नहीं लड़ता
देश के लिये,
उसकी सीमाओं के लिये नहीं लड़ता
देखो माँ
हम हाथ पकड़े यहाँ
साथ में खड़े हैं
सबको देख रहे हैं
माँ, बाबा से भी कहना
कि रोये नहीं
हम आयेगें फिर आयेगें
पर पहले हम जीना सीख लें
फिर सीखायेगें उनको भी
जिन्हें जीना नहीं आता
मारना आता है
माँ, आँसू पोंछकर देखो मुझे
मैं दिख रहा हूँ ना! 
हम सभी आयेगें पर तभी
जब वो दुनिया अपनी सी होगी
नहीं तो हम बच्चे
उस धरती पर कभी जन्म नहीं लेगें
तब दुनिया नष्ट हो जायेगी
है ना! 
पर उससे पहले
माँ, बाबा आप
यहाँ आ जाना हमारे पास
हम यहीं रहेगें
फिर कोई हमें अलग नहीं करेगा
तब तक के लिये तुम मत रोना
हम सब देख रहे हैं
और मैं रोते हुए चुप हूँ
बस एक टक देख रही हूँ
तुझे बेटा
तेरे होने के अहसास के साथ
©दीप्ति शर्मा