यादों की नदी,बातों का झरना
सदियों से साथ बहते,झरते
पर अब झरना सूख गया,
नदी का वेग तीव्र हो गया,
जिसमें कश्तियाँ भी डूब जाती हैं।
(बस यूँ ही ,जिंदगी सच)
# हिन्दी_ब्लॉगिंग
मेरी परछाई
वो कैसी आह की परछाई हैं मैंने खुद को लहरों मे डुबो, तूफानों से ये कश्ती बचायी है | जिस पर अब तक सम्भल मेरी जिंदगी चली आई है | हैं राहें कश्मकस भरी , अजनबी लोगो में रह किस तरह बात समझ पाई है | मुददत से अकेली हूँ मैं , तमन्नाये जीने की मैने तो ये बाजी खुद ही गंवाई है | वो गैरों के भरोसये शौक में आह में डूब ढलती हुई , फिरती वो मेरी ही परछाई है | - दीप्ति शर्मा
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शुभकामनाएं