क्यूँ दर्द समझ कर भी, नासमझ बना करते हैं| वो पत्थर के रोने को झरना कहा करते हैं और उसे देख के हँसते हैं | खलिश दबा सीने में तन्हा जीया करते हैं , तमन्ना नही कोई बस में जान के हर अश्क का अफ़सोस किया करते हैं, वो पत्थर के रोने को झरना कहा करते हैं और उसे देख के हँसते हैं| तस्कीरे बना हर इल्ज्म को अधिकार दिया करते हैं, दिल के जख्मो को जो नकार दिया करते हैं, इंसानों के आंसू को देखा भी नही करते हैं, वो पत्थर के रोने को झरना कहा करते हैं, और उसे देख के हँसते हैं | - दीप्ति शर्मा
Comments
Bahut umda
aik muskurahat ki talash ki chatpatahat behtareen andaaz aur alfaaz me....
कवि अनिल उपहार