हाँ मैं दलित स्त्री हूँ

मैं तो  बरसों  की भाँती 
आज भी यहीं हूँ
तुम्हारे साथ
पर तुम्हारी सोच नहीं बदली
पत्थर तोडते मेरे हाथ
पसीने से तर हुई देह
और तुम्हारी काम दृष्टि
नहीं बदली अब तक
ये हाथों की रेखाएँ
माथे पर पडी सलवटें
बच्चों का पेट नहीं भर सकती
मैं जानती हूँ और तुम भी
कंकाल बन बिस्तर पर पड जाना मेरा
यही चाहते हो तुम
तुम कैसे नहीं सुन पाते सिसकियाँ
भूखे पेट सोते बच्चों की
मेरे भीतर मरती स्त्री की
मैं  दलित हूँ
हाँ मैं दलित स्त्री हूँ
पर लाचार नहीं
भर सकती हूँ पेट
तुम्हारे  बिना
अपना और बच्चों का
अब मेरे घर चूल्हा भी जलेगा
और रोटी भी पकेगी
मेरे बच्चें भूखें नहीं सोयेंगे ।
तुम्हारे कंगूरे , तुम्हारी वासना
तुम्हारी रोटियों , तुम्हारी निगाहों
सब को छोड‌ आई हूँ मैं ।

-- दीप्ति शर्मा

Comments

अति सुन्दर दीप्ति जी
sandy said…
गहन अनुभूति ।
vandan gupta said…
इस साहस की अब जरूरत है।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (27-12-13) को "जवानी में थकने लगी जिन्दगी है" (चर्चा मंच : अंक-1474) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
Anonymous said…
साहसिक एवं प्रेरक प्रस्तुति - बहुत सुंदर
nihshabd.....apni ek kavita neeche likh raha hu, ye sajh lijiye ki aage ki ek kadi.....

''दूर्वा हूँ, मै घास हूँ,
सदा से कुचली
जाती हूँ,
हर कोई कुचल के
चला जाता है,
मैँ जीवन देने वाली
हूँ ,
पर मेरा जीवन
दासता मेँ बीतता है,
कभी पति की,
कभी सास की,
लोग ताने देते हैँ,
और मै सहती हूँ,
डर से नही
मेरा स्वभाव ही ऐसा है.
कष्ट मुझे तब होता है,
जब मेरा जन्मा बेटा ही,
मुझे अपशब्द कहता है.
और मैँ बस
देखती रह जाती हूँ,
मुझे अब सहना बँद करना है,
क्योँकी सहने की एक सीमा होती है,
और उस सीमा को
पुरुष पार कर चुका है.
अब झुकी तो मिट जाऊँगी.
गहन अभिव्यक्ति
आज 28/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

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