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क्यों प्राण प्रियतम आये ना ??

चाँदनी ढल जायेगी फिर
क्या मिलन बेला आयेगी
मिलने को व्याकुल नयन ये तो
क्यों प्राण प्रियतम आये ना?? 
नयन बदरा छा गये
रिम-झिम फुहारों की घटा
मुझमें समाने और अब तक
क्यों प्राण प्रियतम आये ना??
विरह की इस वेदना को
अनुपम प्रेम में ढाल
अमानत बनाने मुझे अपनी
क्यों प्राण प्रियतम आये ना??
मुख गरिमा के चंचल तेवर
अलौकिक कर हर प्रेम भाव
मेरे मुख दर्पण के भाव देखने
क्यों प्राण प्रियतम आये ना??
निहारिका सा प्रेम रूप
छलकत निकट पनघट
निहारने उस प्रेम को
क्यों प्राण प्रियतम आये ना??
दीप्ति शर्मा

Comments

Reena Maurya said…
विरह वेदना को व्यक्त करती
संवेदन भाव लिए अभिव्यक्ति..
:-)
उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।
kshama said…
Behad sundar rachana!
सुशील said…
प्राण प्रियतम आयेंगे सुन
विरह वेदना का सुंदर गीत
दूर कर सब शिकायत
कह उठेंगे जरा बैठो मीत !
प्यारी रचना | बहुत खूब |
अत्यन्त कोमल अभिव्यक्ति

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
अभी कुछ देरपहले
मुझे आवाज़ आयी
माँ , मैं यहाँ खुश हूँ
सब  बैखोफ घूमते हैं
कोई रोटी के लिये नहीं लड़ता
धर्म के लिये नहीं लड़ता
देश के लिये,
उसकी सीमाओं के लिये नहीं लड़ता
देखो माँ
हम हाथ पकड़े यहाँ
साथ में खड़े हैं
सबको देख रहे हैं
माँ, बाबा से भी कहना
कि रोये नहीं
हम आयेगें फिर आयेगें
पर पहले हम जीना सीख लें
फिर सीखायेगें उनको भी
जिन्हें जीना नहीं आता
मारना आता है
माँ, आँसू पोंछकर देखो मुझे
मैं दिख रहा हूँ ना! 
हम सभी आयेगें पर तभी
जब वो दुनिया अपनी सी होगी
नहीं तो हम बच्चे
उस धरती पर कभी जन्म नहीं लेगें
तब दुनिया नष्ट हो जायेगी
है ना! 
पर उससे पहले
माँ, बाबा आप
यहाँ आ जाना हमारे पास
हम यहीं रहेगें
फिर कोई हमें अलग नहीं करेगा
तब तक के लिये तुम मत रोना
हम सब देख रहे हैं
और मैं रोते हुए चुप हूँ
बस एक टक देख रही हूँ
तुझे बेटा
तेरे होने के अहसास के साथ
©दीप्ति शर्मा