Skip to main content

हर लम्हा है तुम्हारा, इसे अपनाकर तो देखो । तन्हा हो कभी तो हमें याद करके दिल में बसाकर तो देखो । हम लगेंगे तुम्हें अपने हमसे ऩजरे मिलाकर तो देखो । याद करो ना करो हम तुम पर मरतें हैं एक बार आज़माकर तो देखो । इस दिल ने तुम्हें चाहा है ये दिल है तुम्हारा इसे अपना बनाकर तो देखो । तुम दिवाने हो जाओगे हमारे बस एक बार हमसे हाथ मिलाकर तो देखो । इधर हाथ बढ़ाकर तो देखो । ,,, " दीप्ति शर्मा "

Comments

Anonymous said…
kya baat h
वाह ... आमंत्रण देती रचना ... बहुत खूब ...
रेखा said…
सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति ..
kshama said…
Bahut sundar rachana hai Deeptee!
बहुत सुन्दर, खुबसूरत...
सुन्दर अभिव्यक्ति.
Chirag Joshi said…
nice lines
romantic
anything special deepti ;)
आशा said…
बहुत खूब लिखा है |
अच्छी प्रस्तुति |
आशा
बेहतरीन भाव।

गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं....

जय हिंद...वंदे मातरम्।
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं आपको .... वाह !! दीप्ति क्या खूब लिखा है आपने बहुत ही सुन्दर शब्दों में पिरोकर एक सुन्दर रचना लिख दी है धन्यवाद

Popular posts from this blog

जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

वो रेल वो आसमान और तुम

रेल में खिडकी पर बैठी
मैं आसमान ताक रही हूँ
अलग ही छवियाँ दिख रही हैं हर बार
और उनको समझने की कोशिश
मैं हर बार करती
कुछ जोड़ती, कुछ मिटाती
अनवरत ताक रही हूँ
आसमान के वर्तमान को या
अपने अतीत को
और उन छवियों में
अपनों को तलाशती
मैं तुम्हें देख पा रही हूँ
वहाँ कितने ही पेड़,
बेंच, कुआँ, सड़क, नाला,पहाड़
निकलते चले जा रहे हैं
इन्हें देख लगता है
इस भागती जिदंगी में
कितने साथ छूटते चले गये
मन के कोने में कुछ याद तो है ही
अब चाहे अच्छी हो ,बुरी हो
और मैं उन्हें ढोती ,रास्ते पार करती
तुम्हें खोज रही हूँ
बहुत बरस बाद आज ,
मन के कोने  से निकल दिखे हो
वहाँ बादलों की छवियों में
और मैं तुम्हें निहार रही हूँ।

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा