दहलीज जो पार की,
मुड़कर नहीं देखा पीछे
पर दहलीज ताकती रही
अपनों को तलाशती रही
कि कोई आएगा अपना लौटकर
इस पार
#दहलीज का दर्द
#बसयूँही
#दीप्तिशर्मा
मेरी परछाई
वो कैसी आह की परछाई हैं मैंने खुद को लहरों मे डुबो, तूफानों से ये कश्ती बचायी है | जिस पर अब तक सम्भल मेरी जिंदगी चली आई है | हैं राहें कश्मकस भरी , अजनबी लोगो में रह किस तरह बात समझ पाई है | मुददत से अकेली हूँ मैं , तमन्नाये जीने की मैने तो ये बाजी खुद ही गंवाई है | वो गैरों के भरोसये शौक में आह में डूब ढलती हुई , फिरती वो मेरी ही परछाई है | - दीप्ति शर्मा
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