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ये आँसू नहीं हैं पागल
किसने कहा तुमसे?
कि मैं रोती हूँ
अब मैं नहीं रोती
मेरे भीतर बरसों से जमी
संवेदनाएँ पिघल रही हैं
धीरे धीरे भावनाएँ रिस रही हैं
खून जम गया है
और मन की चट्टानें टूट रही हैं
मेरे पैर थक गये हैं
और मैं थम गयी हूँ
स्थिर हो गयी हूँ
तो अब भला मैं क्यों रोऊँगी?? 
- दीप्ति शर्मा

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति बहुत प्रभावशाली रचना..
रविकर said…
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।
रविकर said…
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।
रविकर said…
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।
Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
सच शून्य होते मन से आँसू नहीं खून रिसता है अंदर ही अंदर
बहुत सुन्दर

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा

वो रेल वो आसमान और तुम

रेल में खिडकी पर बैठी
मैं आसमान ताक रही हूँ
अलग ही छवियाँ दिख रही हैं हर बार
और उनको समझने की कोशिश
मैं हर बार करती
कुछ जोड़ती, कुछ मिटाती
अनवरत ताक रही हूँ
आसमान के वर्तमान को या
अपने अतीत को
और उन छवियों में
अपनों को तलाशती
मैं तुम्हें देख पा रही हूँ
वहाँ कितने ही पेड़,
बेंच, कुआँ, सड़क, नाला,पहाड़
निकलते चले जा रहे हैं
इन्हें देख लगता है
इस भागती जिदंगी में
कितने साथ छूटते चले गये
मन के कोने में कुछ याद तो है ही
अब चाहे अच्छी हो ,बुरी हो
और मैं उन्हें ढोती ,रास्ते पार करती
तुम्हें खोज रही हूँ
बहुत बरस बाद आज ,
मन के कोने  से निकल दिखे हो
वहाँ बादलों की छवियों में
और मैं तुम्हें निहार रही हूँ।