वो



आंचती हुई काजल को
वो कैसे मुस्कुरा रही है |,

लुफ्त उठा जीवन का
मोहब्बत की झनकार में
अपनी धुन में मस्त उसकी
पायलियाँ गीत गा रही हैं |

केशो को सवारकर 
चुनरी ओढ़ वो घूँघट में
लज्जा से सरमा रही है |

साज सज्जा से हो तैयार
खुद को निहार आइने में
नजरे झुका और उठा रही है |

इंतज़ार में मेरे वो सजके
भग्न झरोखे में छिपकर
मेरा रास्ता ताक रही है |

- दीप्ति शर्मा 

Comments

Anonymous said…
khubsurat
sushmaa kumarri said…
इंतज़ार में मेरे वो सजके
भग्न झरोखे में छिपकर
मेरा रास्ता ताक रही है |bhaut hi gahri rachna....
बहुत सुन्दर, चित्र कविता को सिद्ध करता हुआ।
parag rawal said…
Awesome........ selection of words & salute to your creativity & your way of thinking & expressing it.. keep it up...
बहुत अच्छा और भावपूर्ण मुक्तक...........बधाई हो दीप्ति !!!
बहुत ही खूबसूरत कविता।

सादर
बहुत सुन्दर भावप्रणव प्रस्तुति।
Amrita Tanmay said…
बहुत सुन्दर लिखा है..
सुंदर प्रस्‍तुति।
गहरे भाव।
बहुत खूबसूरत कविता...
दीप्ति जी बहुत सुन्दर कोमल प्यारी रचना प्रेम से सराबोर थोडा शब्दों को हिंदी बनाते समय और ध्यान रखिये जैसे निम्न देखिये ..और लिखिए ..सार्थक आनंद दाई .. ....शुभ कामनाएं
आँजती
केशों को संवारकर
शरमा
नजरें

शुक्ल भ्रमर ५
प्रतापगढ़ उ.प्र.
प्रेम के एहसास में डूबी गहरी रचना ... बहुत कुछ कह रहा है साथ लगा चित्र भी ...

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