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सपना


घुप्प अँधेरा पसरा  है
बाहर दूर खलियानों से
भीतर के कोनों तक ।
एका एक बारिस
और छत से गिरता पानी
बिजली की गडगडाहट भी
डरा रही है ।
दियासलाई के डिब्बे में भी
सिर्फ एक दियासलाई ,
उससे भी लालटेन जला दी ,
वो भी भप भप कर
जलती दिख रही है ,
शायद तेल कम है ।
तभी पास में रखे उजले डिब्बे
की तरफ निगाह गयी
जो अपनी रौशनी से जगमगा रहा है
उसे हाथ में उठा लिया ,
जिसमें जुगनू आपस में भिड रहे हैं ,
जो मैंने एक एक कर जमा किये
जैसे कह रहे हों
मैं तुझसे ज्यादा चमकता हूँ
और इस भिंडत में ,
और ज्यादा रौशन हो रहे हैं ।
उन्हें देखते हुए सब भूल
दिवार पर सिर टिका बैठ गयी
तभी तेज़ आँधी और तुफान आने से
मेरे हाथों से , वो जुगनुओं का डिब्बा छुट गया
जुगनू छितरा गये
बिखर गये इधर उधर
मैं हतप्रत बस देखती रही
इतना अँधेरा !!!!
अब लालटेन भी बुझ चुकी है
पेड उखड गये हैं ,
पौधे टूट गये हैं
मेरी छत भी तो उड गयी है
उस तूफान में सब बिखर गया ।
तभी दूर से आती हल्की रौशनी
अब और तेज़ होने लगी
हर तरफ फैल गयी
और मैं मलते देखती हूँ
कि सवेरा हो गया
वो आँधी , बारिस , अँधेरा
सब पीछे छूट गया
वो मेरा भयावह सपना
अब टूट गया ।
दीप्ति शर्मा

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जन्मदिन

आज मेरी प्यारी बहिन का जन्मदिन है और मैं बहुत खुश हूँ ,, मेरी तरह से उसे ढेरो शुभकामनाये ,,, कृपया आप भी अपना बहुमूल्य आशीर्वाद उसे प्रदान करें |

आज जन्मदिवस पर तेरे ,
ओ मेरी प्यारी बहिन
दुलार करते हैं सभी
प्यार करते हैं सभी

हजार ख्वाहिशें जुडी हैं
माँ पापा की तुझसे
रौशन है ये आँगन तुझसे
कह दे तू ये आज मुझसे
न दूर हो हम कभी भी
अब एक दूजे से

जफ़र पा ओ मेरी बहिन
घर जल्दी आना तू अबकी
आँखों का तारा हैं तू सबकी

तेरा सपना सच हो जाये
हर ख्वाहिश पूरी हो जाये
जन्मदिन पर मिले तुझे
सबका इतना आशीष
की हर बाला आने से
पहले ही टल जाये

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक हो प्रीती .

- दीप्ति शर्मा

शोषित कोख

उस बारिश का रंग दिखा नहीं
पर धरती भींग गयी
बहुत रोई !
डूब गयी फसलें
नयी कली ,
टहनी टूट लटक गयीं
आकाश में बादल नहीं
फिर भी बरसात हुई
रंग दिखा नहीं कोई
पर धरती
कुछ सफेद ,कुछ लाल हुई
लाल ज्यादा दिखायी दी
खून सी लाल
मेरा खून धरती से मिल गया है
और सफेद रंग
गर्भ में ठहर गया है,
शोषण के गर्भ में
उभार आते
मैं धँसती जा रही हूँ
भींगी जमीन में,
और याद आ रही है
माँ की बातें
हर रिश्ता विश्वास का नहीं
जड़ काट देता है
अब सूख गयी है जड़
लाल हुयी धरती के साथ
लाल हुयी हूँ मैं भी।
-- दीप्ति शर्मा
अभी कुछ देरपहले
मुझे आवाज़ आयी
माँ , मैं यहाँ खुश हूँ
सब  बैखोफ घूमते हैं
कोई रोटी के लिये नहीं लड़ता
धर्म के लिये नहीं लड़ता
देश के लिये,
उसकी सीमाओं के लिये नहीं लड़ता
देखो माँ
हम हाथ पकड़े यहाँ
साथ में खड़े हैं
सबको देख रहे हैं
माँ, बाबा से भी कहना
कि रोये नहीं
हम आयेगें फिर आयेगें
पर पहले हम जीना सीख लें
फिर सीखायेगें उनको भी
जिन्हें जीना नहीं आता
मारना आता है
माँ, आँसू पोंछकर देखो मुझे
मैं दिख रहा हूँ ना! 
हम सभी आयेगें पर तभी
जब वो दुनिया अपनी सी होगी
नहीं तो हम बच्चे
उस धरती पर कभी जन्म नहीं लेगें
तब दुनिया नष्ट हो जायेगी
है ना! 
पर उससे पहले
माँ, बाबा आप
यहाँ आ जाना हमारे पास
हम यहीं रहेगें
फिर कोई हमें अलग नहीं करेगा
तब तक के लिये तुम मत रोना
हम सब देख रहे हैं
और मैं रोते हुए चुप हूँ
बस एक टक देख रही हूँ
तुझे बेटा
तेरे होने के अहसास के साथ
©दीप्ति शर्मा