अस्तित्व की तलास

                                              
दुनिया में रह मुझे उन तमाम 
हस्तियों को पहचानना ही पड़ा |
हर नए सफ़र की मुश्किलों को
उन उलझनों को अपना समझ 
दिल से उन्हें मानना ही पड़ा |
जहाँ में खोये हुए अपने वजूद को
इत्मिनान से तलाशना ही पड़ा |
अपने कुछ उसूलों की खातिर 
उस अस्तित्व को खोजते हुए
मुझे अपने आप को जानना ही पड़ा |
- दीप्ति शर्मा 

Comments

Anonymous said…
waah waah
रेखा said…
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..
vandan gupta said…
ek mod par aakaar janna hi padta hai.
आपकी हर रचना की तरह यह रचना भी बेमिसाल है !
एक और सुन्दर कविता आपकी कलम से !
वजूद को तलाशते खुद को ही तो जानना होगा !
Anonymous said…
जानना जरुरी है - आशीष
बहुत बढ़िया रचना |

मेरे ब्लॉग में भी पधारें |
**मेरी कविता**
Sunil Kumar said…
अपने को जानना और पहचानना जरुरी है अच्छी रचना ......
आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।
बूँद हूँ - सागर नदी
तृप्ति हूँ या प्यास हूँ .
टूटी हुई आस -या
खोया हुआ विश्वाश हूँ .
भोर का कलरव- या मौन हूँ मैं
दसों दिशाएं पूंछती हैं -मुझसे
ना जाने कौन हूँ मैं .
sushmaa kumarri said…
बहुत ही सुन्दर अभिवयक्ति....
बहुत हि शानदार पस्तुति
अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से 1 ब्लॉग सबका

कृपया फालोवर बनकर उत्साह वर्धन कीजिये
कल 14/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
दूसरो को जानने से पहले खुद को और अपने वजूद को जानना जरूरी है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...
बिना स्वयं को जाने निर्वाण भी नहीं है।
बहुत खुबसूरत अभिव्यक्ति |
prerna argal said…
सबसे पहले हिंदी दिवस की शुभकामनायें /
बहुत ही सुंदर और गहन सोच को उजागर करती हुई बेमिसाल रचना /बहुत बधाई आपको /
मेरी नई पोस्ट हिंदी दिवस पर लिखी पर आपका स्वागत है /
http://prernaargal.blogspot.com/2011/09/ke.html/ आभार/
Kunwar Kusumesh said…
बढ़िया रचना

Popular posts from this blog

डायरी के पन्नें

मैं

बताऊँ मैं कैसे तुझे ?