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Showing posts from August, 2017
पर्वत पिघल रहे हैं घास,फूल, पत्तीयाँ बहकर जमा हो गयीं हैं एक जगह हाँ रेगिस्तान जम गया है मेरे पीछे ऊँट काँप रहा है बहुत से पक्षी आकर दुबक गये हैं हुआ क्या ये अचानक सब बदल रहा प...