वो कैसी आह की परछाई हैं मैंने खुद को लहरों मे डुबो, तूफानों से ये कश्ती बचायी है | जिस पर अब तक सम्भल मेरी जिंदगी चली आई है | हैं राहें कश्मकस भरी , अजनबी लोगो में रह किस तरह बात समझ पाई है | मुददत से अकेली हूँ मैं , तमन्नाये जीने की मैने तो ये बाजी खुद ही गंवाई है | वो गैरों के भरोसये शौक में आह में डूब ढलती हुई , फिरती वो मेरी ही परछाई है | - दीप्ति शर्मा
वो लम्हे हमें हैं अब याद आते , ना भूले हैं जानम ना भूल पाते , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो लहरों की कस्ती , वो फूलो की वादी , सितारों की झिलमिल , कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो चूड़ी की छनछन , वो पायल की खनखन , कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो कोयल की कूंह कूंह , वो झरने का झरना , रिमझिम सी बारिश, कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? फूलों की ख़ुशबू , महकता वो आँगन , मोहब्बत वो मेरी , कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? - दीप्ति
रौशन जहाँ की ही ख्वाहिश की है मैंने अपने दिल की झूठे बाज़ार में सच्चाई के साथ आजमाइश की है | मालूम है बस फरेब है यहाँ तो फिर क्यों मैंने सपन भर आँखों में अपने उसूलों की नुमाइश की है | जब मेरी जिन्दगी मेरी नहीं तो क्यों? ख्वाब ले जीने की गुंजाइश की है | कुछ जज्बात हैं मेरे इस दिल के उनको समझ खुदा से मैंने बस कुछ खुशियों की फरमाइश की है | मैनें तो बस कुछ लम्हों के लिए रौशन जहाँ की ख्वाहिश की है | - दीप्ति शर्मा
Comments
आभार
काफी उम्दा रचना....बधाई...
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आभार
हिमकर श्याम
http://himkarshyam.blogspot.in/