ख़ामोश रही मैं|

क्यूँ तुझे पाने तक,
तेरे पास आने तक,
यूँ ख़ामोश रही मैं|
लेके एहसास  तेरा,
दिल में  प्यार तेरा,
यूँ  ख़ामोश रही मैं |
अजनबी परछाई थी ,
अश्क आँखों में लिए,
तेरी याद बहुत आई थी,
याद लिए तेरी दिल में,
यूँ ख़ामोश रही मैं|
जब से तू चला गया,
तेरी वो महक तब से,
इस तन में समायी थी,
तू समा जाये मुझमें ,
मैं समाऊं तुझमे,
ये सोच आज तक ,
यूँ ख़ामोश रही मैं|
जैसे  तेरे आने की,
दिल को आहट थी |
- दीप्ति शर्मा 

Comments

teri khamoshi teri kalam ke shor me najar aati hai
abhi waqt bahut hai deepti isi tarah se sohrat payi jaati hai.
अजनबी परछाइयों के बिछोड़े... वाह !

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