आजमाइश

आजमाना न था साथी
जीवन की आजमाइश में
 जिंदगी को तौलता तराजू
सूरज बना,

तुम कंधे पर बैठ उसके
थामनें लगे दुनिया
पकड़ने लगे पीलापन

मुट्ठी बंद करते ही 
अंधेरा हो गया

पीलापन छूटा तो
आजमाया तुमनें
रिश्तों की गहराइयों को

अंधेरा हुआ तो
कंधा छूट गया
परछाई का साथ मिला

अब क्या
सूरज के कंधे की सवारी 
चश्में के लेंस में दिख रही

तुम आजमाते रहे
जिंदगी नाचती रही
उजाला,अंधेरा हुआ

आँखों का चश्मा
जिंदगी की रौशनी ले
डूब गया अंततः ।

-दीप्ति शर्मा

Comments

Anita said…
गहन जीवनदृष्टि को उजागर करती सुंदर रचना
आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (30-03-2022) को चर्चा मंच       "कटुक वचन मत बोलना"   (चर्चा अंक-4385)     पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार कर चर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।
-- 
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   
गहन एहसास ।
सुंदर सृजन।
गहन एहसासों का सुंदर सृजन।
Anita said…
सुंदर सृजन
yashoda Agrawal said…
आपकी लिखी रचना  ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" मंगलवार 03 मई 2022 को साझा की गयी है....
पाँच लिंकों का आनन्द पर
आप भी आइएगा....धन्यवाद!

Anita said…
अति सुंदर रचना
शुभा said…

वाह!बहुत खूब!
शुभा said…

वाह!बहुत खूब!
गांधारी ने कहा होगा.
पट्टी बनाम चश्मा....दुविधा .

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