राजपथ पर चलती मैं अकेली
धूप से बचती
छतरी ओढे
चली जा रही हूँ
धूप की तेज़ किरणें
छतरी को पार कर
मुझे जला रही हैं
और मैं
सुकडती चली जा रही हूँ ,
वहीं पास से लोगों का हूजूम निकल रहा है
लोग नारे लगा रहे हैं ,
बलात्कार के दोषियों को फाँसी दो ,
बडे-बडे पोस्टर लटकाये , बडे बेनर उठाये
चले जा रहे हैं ,
उनमें कुछ परेशान हैं
देश की व्यवस्था को लेकर
और कुछ भीड में पीछे चल ,
भीड बढा रहे हैं ,
वो फोन में अश्लील चित्र / फिल्में देख रहे
और मुस्कुरा रहे हैं ,
साथ में नारी हक में नारे लगा रहे है ,
वो आज फिल्में देख मुस्कुरा रहे हैं
कल बलात्कार कर खिलखिलायेगें
अपनी मर्दनगी पर इठलायेगे ,
ये देख
मैं वहीं किनारे सडक पर बैठ गयी
और सोचने लगी
कि कल फिर क्या ये
किसी भीड का हिस्सा बन
नारे लगायेगें
बलात्कारियों को फाँसी दो !
या फिर किसी और हूजूम में
इकट्ठे हों
हिंदुस्तान जिन्दाबाद के नारे लगायेगें ।
© दीप्ति शर्मा
बताऊँ मैं कैसे तुझे ?
वो लम्हे हमें हैं अब याद आते , ना भूले हैं जानम ना भूल पाते , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो लहरों की कस्ती , वो फूलो की वादी , सितारों की झिलमिल , कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो चूड़ी की छनछन , वो पायल की खनखन , कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? वो कोयल की कूंह कूंह , वो झरने का झरना , रिमझिम सी बारिश, कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? फूलों की ख़ुशबू , महकता वो आँगन , मोहब्बत वो मेरी , कहाँ खो गयी , बताऊँ मैं कैसे तुझे ? - दीप्ति
Comments
शुभ प्रभात
सच ही तो है
आजकल
सही में
कुछ कहा नहीं जा सकता
कि मन में कुछ और है
और तन मांगे कुछ और है
कड़ुआ सच बयां किया
आपने
सादर
आभार ।
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