ये आँसू नहीं हैं पागल
किसने कहा तुमसे?
कि मैं रोती हूँ
अब मैं नहीं रोती
मेरे भीतर बरसों से जमी
संवेदनाएँ पिघल रही हैं
धीरे धीरे भावनाएँ रिस रही हैं
खून जम गया है
और मन की चट्टानें टूट रही हैं
मेरे पैर थक गये हैं
और मैं थम गयी हूँ
स्थिर हो गयी हूँ
तो अब भला मैं क्यों रोऊँगी?? 
- दीप्ति शर्मा

Comments

बहुत सुन्दर प्रस्तुति बहुत प्रभावशाली रचना..
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।
आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।
Pratibha Verma said…
बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
सच शून्य होते मन से आँसू नहीं खून रिसता है अंदर ही अंदर
बहुत सुन्दर

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