Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps - January 20, 2013 लहरों को देखकर डर जाते हो तुम आँखें बंद कर सिहर जाते हो तुम जानते हो डूब जाओगे समन्दर में तो जानकर भी पास क्यों जाते हो तुम । © दीप्ति शर्मा Get link Facebook X Pinterest Email Other Apps Comments yashoda Agrawal said… समंदरसच मेंआँखे बन्द करडूबी रहती हूँकिनारे बैठकर दिगम्बर नासवा said… बहुत खूब ... डूबना गर नियति में है तो क्या करे कोई ... समुन्दर के पास तो उसे आना ही है ...बहुत ही लाजवाब मुक्तक ... Yashwant R. B. Mathur said… बहुत खूब! मेरा मन पंछी सा said… बहुत सुन्दर ....:-) मेरा मन पंछी सा said… बहुत सुन्दर ....:-) Unknown said… बहुत ही लाजवाब Unknown said… बहुत ही लाजवाब प्रवीण पाण्डेय said… जब तक डूबने का आनन्द न आये, लहरें भी डराती हैं। Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said… वाऽह ! बहुत ख़ूब ! दीप्ति जी बहुत बढ़िया ! Dinesh Prajapati said… लाजवाब लिखा है जी आपने अपना-अंतर्जाल एचटीएमएल हिन्दी में amrendra "amar" said… बेहतरीन अहसास संध्या शर्मा said… लाजवाब... संगीता स्वरुप ( गीत ) said… बहुत खूब
Comments
सच में
आँखे बन्द कर
डूबी रहती हूँ
किनारे बैठकर
बहुत ही लाजवाब मुक्तक ...
:-)
:-)
वाऽह !
बहुत ख़ूब !
दीप्ति जी बहुत बढ़िया !
अपना-अंतर्जाल
एचटीएमएल हिन्दी में